January 27, 2026
National

भारतीय शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण और प्रसार को समर्पित 54 दुर्लभ प्रकाशन

54 rare publications dedicated to the preservation and propagation of Indian classical languages

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भारतीय शास्त्रीय भाषाओं के संरक्षण और प्रसार को समर्पित कुल 55 महत्वपूर्ण प्रकाशनों का विमोचन किया। 6 जनवरी को नई दिल्ली में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भारतीय शास्त्रीय भाषाई ग्रंथों व साहित्य को लेकर यह पहल की गई।

इस अवसर पर केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान के अंतर्गत शास्त्रीय कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और उड़िया भाषाओं के लिए स्थापित उत्कृष्टता केंद्रों द्वारा विकसित 41 साहित्यिक कृतियों का विमोचन किया गया। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के मुताबिक ये कृतियां भारत की प्राचीन भाषाई परंपराओं और उनकी विद्वतापूर्ण विरासत को संरक्षित करने के उद्देश्य से तैयार की गई हैं। इन पुस्तकों का विमोचन इसलिए किया गया ताकि शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और भाषा-प्रेमियों को समृद्ध एवं प्रमाणिक सामग्री उपलब्ध हो सके।

इस विशेष कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान द्वारा विकसित 13 पुस्तकों और तिरुक्कुरल पर आधारित 45-एपिसोड की भारतीय सांकेतिक भाषा में व्याख्यात्मक श्रृंखला का भी लोकार्पण किया गया। तिरुक्कुरल का यह सांकेतिक भाषा संस्करण श्रवण-दिव्यांग शिक्षार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। यह पहल इस महान तमिल कृति को अधिक समावेशी और सबके लिए सुलभ बनाती है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय का मानना है कि यह पहल भारत की शास्त्रीय भाषाओं की निरंतरता, उनके अकादमिक विस्तार और नई पीढ़ी तक उनकी सहज पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। इस कार्यक्रम ने न केवल साहित्यिक धरोहर को नई ऊर्जा प्रदान की, बल्कि भाषा-अध्ययन को तकनीक और नवाचार से जोड़कर उसे आधुनिक समय के अनुरूप भी बनाया।

इस अवसर पर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि आज भारत की पांच शास्त्रीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले विभिन्न संस्थानों की कुल 55 दुर्लभ और मूल्यवान साहित्यिक कृतियों का विमोचन किया गया। उन्होंने बताया कि तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और उड़िया—इन पांचों भाषाओं को भारत सरकार द्वारा शास्त्रीय भाषाओं का दर्जा प्राप्त है। ये भाषाएं देश की प्राचीनता, समृद्धि और सांस्कृतिक प्रवाह का प्रतीक हैं।

प्रधान ने कहा कि भारत की भाषाएं समाज को एक सूत्र में पिरोने का कार्य करती हैं। देश में एक हजार से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं, जो भारत की सांस्कृतिक विविधता और भाषाई संपदा का प्रमाण हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस कथन को भी दोहराया जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत की सभी भाषाएं ही राष्ट्रीय भाषाएं हैं, क्योंकि हर भाषा इस देश की आत्मा और पहचान को अत्यंत समृद्ध करती है। शिक्षा मंत्री ने इस अवसर को भारतीय भाषाई धरोहर के प्रति सम्मान और उसके संरक्षण के प्रति संकल्प का क्षण बताया।

उन्होंने कहा कि दुर्लभ साहित्यिक कृतियों का यह व्यापक विमोचन न केवल शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत की भाषाई विविधता को नई पीढ़ी से जोड़ने का एक प्रभावी माध्यम भी है। यह पहल शास्त्रीय भाषाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाने, उनके अध्ययन को बढ़ावा देने और भाषाई समावेशन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

उन्होंने कहा कि भारत की भाषायी विरासत को आगे बढ़ाने और शास्त्रीय भाषाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में आज 55 विद्वत ग्रंथों का विमोचन राष्ट्र की बौद्धिक चेतना के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, ओड़िया, तमिल एवं सांकेतिक भाषा में प्रस्तुत ये कृतियां भारत की भाषायी विरासत को शिक्षा, अनुसंधान और सांस्कृतिक स्वाभिमान के केंद्र में प्रतिष्ठित करती हैं। तिरुक्कुरल का सांकेतिक भाषा में भावार्थ समावेशी भारत की उस दृष्टि को सशक्त करता है, जहां ज्ञान की पहुंच सभी तक सुनिश्चित हो। यह विमोचन कार्य भारत के बौद्धिक वाङ्मय में एक मूल्यवान योगदान है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय भाषा आधारित शिक्षा की परिकल्पना को आगे बढ़ाती है। भारत विविधता में एकता का जीवंत उदाहरण है, जहाँ भाषा कभी बाधा नहीं, समाज को जोड़ने का माध्यम रही है।

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