N1Live National आजादी के 79 साल बाद सीमांत जिलों के बच्चे किताबें खोल रहे हैं: असम सीएम सरमा
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आजादी के 79 साल बाद सीमांत जिलों के बच्चे किताबें खोल रहे हैं: असम सीएम सरमा

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने गुरुवार को राज्य के दूरदराज के चाय बागानों वाले इलाकों में पढ़ाई की सुविधाओं के विस्तार पर जोर देते हुए कहा कि गुवाहाटी से 500 किलोमीटर से ज्‍यादा दूर स्थित सीमांत जिलों में रहने वाले बच्चे पहली बार किताबें खोल रहे हैं।

सरमा ने सोशल मीडिया प्‍लेटफॉर्म एक्‍स पर एक पोस्ट में इस डेवलपमेंट को शेयर किया, जिसमें बताया गया कि कैसे शिक्षा धीरे-धीरे असम के कुछ सबसे अलग-थलग समुदायों तक पहुंच रही है, जहां बुनियादी पढ़ाई की सुविधाओं तक पहुंच एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। मुख्यमंत्री ने कहा, “गुवाहाटी से 500 किमी से ज्‍यादा दूर, असम के चाय बागानों के बीचों-बीच, बच्चे पहली बार किताबें खोल रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि भारत की आजादी के 79 साल बाद, शिक्षा आखिरकार इन दूर-दराज के सीमांत ज‍िलों तक पहुंच गई है। असली बदलाव ऐसा ही दिखता है। मुख्यमंत्री के पोस्ट में दूरदराज और पिछड़े इलाकों के बच्चों को पढ़ाई के मौके देने की अहमियत पर जोर दिया गया, खासकर उन इलाकों में रहने वाले बच्चों को जहां भौगोलिक अलगाव और कम इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से स्कूल तक पहुंच पर पहले से असर पड़ा है।

असम में चाय उगाने वालों की अच्छी-खासी आबादी है और कई चाय बागान समुदाय दूरदराज के जिलों में फैले हुए हैं। इन इलाकों के बच्चों को अक्सर मुश्किल इलाके, लंबी दूरी और सीमित इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से शिक्षा संस्थानों तक पहुंचने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

ऐसी जगहों पर शैक्षणिक सुविधाओं को बढ़ाना, औपचारिक शिक्षा तक पहुंच में लंबे समय से चली आ रही कमी को दूर करने और यह पक्का करने के लिए जरूरी है कि आर्थिक और भौगोलिक रूप से पिछड़े समुदायों के बच्चे पीछे न छूट जाएं।

यह डेवलपमेंट राज्य सरकार के एजुकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने और पूरे असम में स्कूल तक पहुंच बढ़ाने पर ज्‍यादा जोर देने के बैकग्राउंड में भी हुआ है। सीएम सरमा की बातें उन समुदायों के दरवाजे तक शैक्षणिक सुविधाएं पहुंचाने की अहमियत को दिखाती हैं, जो दशकों से मुख्यधारा के विकास से बाहर रहे हैं।

मुख्यमंत्री सरमा ने बताया, यह पहल शहरी केंद्रों और दूर-दराज के चाय बागानों के बीच शिक्षा के अंतर को कम करने की कोशिश को दिखाती है, जिससे इन इलाकों के बच्चों को औपचारिक शिक्षा पाने और बेहतर भविष्य पाने का मौका मिलता है।

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