January 1, 2026
National

झारखंड : 77 साल पहले हजारों निर्दोष लोगों के खून से लाल हुई थी खरसावां की धरती, शहीदों को नमन करने पहुंचे सीएम हेमंत

Jharkhand: 77 years ago, the land of Kharsawan was red with the blood of thousands of innocent people; CM Hemant Singh arrives to pay homage to the martyrs.

नववर्ष का पहला दिन जहां दुनिया भर में उल्लास और उत्सव का प्रतीक है, वहीं झारखंड के खरसावां के लिए यह तारीख आज भी एक गहरे जख्म की तरह है। आज़ादी के बाद 1 जनवरी 1948 को खरसावां की धरती पर ऐसा रक्तपात हुआ, जिसकी तुलना जलियांवाला नरसंहार से की जाती है। उस दिन हजारों आदिवासियों पर गोलियां चलीं, जब वे खरसावां और सरायकेला रियासत को तत्कालीन उड़ीसा में मिलाए जाने के फैसले के खिलाफ अपनी आवाज उठाने के लिए एकत्र हुए थे। हर वर्ष की तरह इस बार भी शहीदों की स्मृति में 1 जनवरी को खरसावां स्थित शहीद स्मारक पर बड़ी संख्या में लोग जुटे।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, मंत्री दीपक बिरुवा, सिंहभूम की सांसद जोबा मांझी, चक्रधरपुर के विधायक सुरखराम उरांव, खरसावां के विधायक दशरथ गागराई और ईचागढ़ की विधायक सविता महतो ने भी स्मारक पर पहुंचकर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।

इस गोलीकांड की पृष्ठभूमि देश की आजादी के बाद रियासतों के विलय और राज्यों के पुनर्गठन से जुड़ी है। उस समय खरसावां और सरायकेला को उड़ीसा में शामिल किए जाने का प्रस्ताव सामने आया था, जिसका स्थानीय आदिवासी समाज ने कड़ा विरोध किया। वे उड़ीसा में विलय के बजाय अलग राज्य की मांग कर रहे थे।

इसी मांग को लेकर 1 जनवरी 1948 को खरसावां हाट मैदान में एक विशाल सभा आयोजित की गई थी, जिसकी अगुवाई आदिवासी नेता मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा को करनी थी। सभा में शामिल होने के लिए जमशेदपुर, रांची, चाईबासा, सिमडेगा, खूंटी, तमाड़ सहित कई दूरस्थ क्षेत्रों से आदिवासी आंदोलनकारी खरसावां पहुंचे थे। किसी कारणवश जयपाल सिंह मुंडा सभा स्थल पर नहीं पहुंच सके। इसके बाद वहां मौजूद लोगों ने खरसावां राजमहल जाकर राजा को अपनी मांगों से अवगत कराने का निर्णय लिया।

उधर, उड़ीसा सरकार ने पहले से ही भारी पुलिस बल तैनात कर रखा था। जैसे ही हजारों की भीड़ राजमहल की ओर बढ़ी, पुलिस ने उन्हें रोकने की चेतावनी दी। चेतावनी की अनदेखी होने पर पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। आदिवासी आंदोलन के इतिहास में इस घटना को सबसे क्रूर दमन के रूप में याद किया जाता है। जयपाल सिंह मुंडा ने 11 जनवरी 1948 को अपने भाषण में कहा था कि खरसावां बाजार में लाशें बिछी थीं, घायल मदद और पानी के लिए तड़प रहे थे, लेकिन प्रशासन ने न तो किसी को भीतर आने दिया और न ही बाहर जाने की अनुमति दी।

उन्होंने आरोप लगाया था कि शाम होते ही शवों को ट्रकों में भरकर जंगलों और नदियों में ठिकाने लगा दिया गया। घटना के 76 वर्ष बीत जाने के बावजूद आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि खरसावां गोलीकांड में वास्तव में कितने लोग मारे गए थे। इस नरसंहार की जांच के लिए गठित ट्रिब्यूनल की रिपोर्ट भी अब तक सार्वजनिक नहीं हो पाई है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने श्रद्धांजलि अर्पित करने के बाद कहा कि आज शहीद दिवस और साल की पहली तारीख भी है। पूरी दुनिया के लिए नया साल हैप्पी न्यू ईयर का दिन है। मगर, झारखंड के आदिवासी, मूलवासी, किसान और मजदूरों के लिए यह शहीद दिवस है। शहीदों के इतिहास से झारखंड भरा पड़ा है। इतने शहीद शायद ही किसी राज्य में हों।

मुख्यमंत्री ने कहा कि खरसावां के गोलीकांड के शहीदों को खोज-खोज कर सम्मान दिया जाएगा। इसका मसौदा तैयार कर लिया गया है। इसके लिए न्यायिक जांच आयोग बनाया जाएगा। रिटायर जज इसमें रखे जाएंगे। अगले साल के शहीद दिवस से पहले ही इस गोलीकांड के शहीदों को सम्मान दिया जाएगा।

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