February 28, 2026
Entertainment

जब राज कपूर ने कराया रवींद्र जैन को सालों तक इंतजार, ‘राम तेरी गंगा मैली’ से जुड़ा दिलचस्प किस्सा

When Raj Kapoor made Ravindra Jain wait for years, an interesting story related to ‘Ram Teri Ganga Maili’

हिंदी सिनेमा में संगीत के महानायक रवींद्र जैन की जिंदगी एक कठिन यात्रा थी। शुरुआत में उन्होंने कई फिल्मों में संगीत दिया, लेकिन उनकी चाह थी कि वे राज कपूर के साथ काम करें। उन्होंने खुद कई इंटरव्यूज में कहा कि वे राज कपूर से लगातार मिलते रहे, फोन करते रहे और उनसे नियमित रूप से अपना काम साझा करते रहे।

उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि राज कपूर साहब ने हमेशा कहा, ”जब सही समय आएगा, मैं मौका दूंगा। बस लगातार काम करते रहना।” वह काम करते रहे और राज कपूर के एक कॉल का इंतजार करते रहे।

कई सालों बाद राज कपूर ने रवींद्र जैन को पुणे में अपनी जन्मदिन की पार्टी में बुलाया। इस पार्टी में राज कपूर ने रवींद्र से गाना गाने को कहा। जैसे ही उन्होंने ‘सुन साहिबा सुन’ गाना राज कपूर के सामने गाया, उनके चेहरे पर खुशी की चमक आ गई और उत्साह भरी आवाज में कहा, ”बस, यही है। तुम मेरी अगली फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ के लिए काम करोगे।”

यह वह पल था जिसने रवींद्र जैन के करियर को नए मुकाम पर पहुंचा दिया। फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ की कहानी तो लोगों ने पसंद की, साथ ही इसके गानों को भी खूब प्यार दिया। गाने के लिए रवींद्र जैन को फिल्मफेयर का बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का अवॉर्ड मिला।

उनके जीवन के बारे में बात करें तो, रवींद्र जैन का जन्म 28 फरवरी, 1944 को अलीगढ़ में हुआ था। बचपन में उनके पिता ने उन्हें घर पर ही संगीत की शिक्षा दी। उनको देश के पांच रेडियो स्टेशनों में ऑडिशन के दौरान मना कर दिया गया था। उनकी जिंदगी में मोड़ तब आया जब गुरु राधे श्याम झुनझुनवाला ने एक फिल्म में उन्हें मौका दिया और 1969 में अपने साथ मुंबई ले आए।

रवींद्र जैन ने बतौर संगीत निर्देशक 14 जनवरी 1971 को राधेश्याम झुनझुनवाला की फिल्म ‘लोरी’ के लिए पहला गीत रिकॉर्ड कराया। मोहम्मद रफी द्वारा गाए इस गीत के बोल थे ‘ये सिलसिला है प्यार का चलता ही रहेगा।’ इसके बाद लोरी के लिए रवींद्र जैन ने लता मंगेशकर से चार गीत और एक गीत लता और आशा से गवाया। लेकिन, राधे श्याम फिल्म पूरी नहीं कर सके।

रवींद्र जैन के संगीत निर्देशन में जो पहली फिल्म रिलीज हुई, वो ‘कांच और हीरा’ (1972) थी। इस फिल्म में रवींद्र जैन ने फिर रफी साहब से एक गीत गवाया, जिसके बोल थे ‘नजर आती नहीं मंजिल’। ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाल नहीं कर पाई, लेकिन रवींद्र जैन के काम की सराहना हुई। इसके बाद उन्होंने ‘सौदागर’, ‘चोर मचाए शोर’, ‘चित चोर’, ‘तपस्या’, ‘हम नहीं सुधरेंगे’, ‘खून खराबा’, ‘प्रतिशोध’, ‘ये कैसा इंसाफ’, ‘कहानी फूलवती की’, ‘मुझे कसम है’, ‘माटी बलिदान की’, ‘गुलामी की जंजीर’ जैसी और भी कई फिल्मों के लिए काम किया और लोकप्रियता हासिल की।

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