9 मई । पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी की पहली सरकार केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है बल्कि यह सामाजिक और जातीय संतुलन की एक नई राजनीतिक रणनीति का भी संकेत मानी जा रही है।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार में अलग-अलग जातीय और सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देकर पार्टी ने साफ संदेश देने की कोशिश की है कि उसका लक्ष्य केवल राजनीतिक जीत नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता भी है।
नई कैबिनेट की संरचना पर नजर डालें तो इसमें पश्चिम बंगाल के कई प्रभावशाली सामाजिक वर्गों को जगह मिली है। खुद सुवेंदु अधिकारी ब्राह्मण समुदाय से आते हैं जबकि दिलीप घोष ओबीसी चेहरे के रूप में लंबे समय से भाजपा की राजनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। अग्निमित्रा पॉल कायस्थ समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं। वहीं अशोक कीर्तनिया को मंत्री बनाकर भाजपा ने मतुआ समुदाय को बड़ा संदेश दिया है, जो राज्य की राजनीति में निर्णायक प्रभाव रखता है।
इसके अलावा, खुदीराम टुडू के जरिए आदिवासी समाज को प्रतिनिधित्व दिया गया है जबकि निसिथ प्रामाणिक राजबंशी समुदाय का बड़ा चेहरा माने जाते हैं। उत्तर बंगाल की राजनीति में राजबंशी वोट बैंक बेहद अहम माना जाता है और भाजपा लंबे समय से इस सामाजिक समीकरण पर काम करती रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने बंगाल में वही सामाजिक मॉडल अपनाने की कोशिश की है जो उसने उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में अपनाया था। यानी अलग-अलग जातीय समूहों को सत्ता में भागीदारी देकर व्यापक सामाजिक गठबंधन तैयार करना।
इस पूरी रणनीति में नितिन नवीन की भूमिका भी चर्चा में रही। चुनाव से पहले भाजपा ने उन्हें पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर संगठनात्मक स्तर पर बड़ा संदेश दिया था। बिहार की राजनीति से आने वाले नितिन नवीन को भाजपा ने ऐसे चेहरे के रूप में आगे बढ़ाया, जो पूर्वी भारत की सामाजिक संरचना और जातीय समीकरणों को बेहतर तरीके से समझते हैं।
पश्चिम बंगाल चुनाव में नितिन नवीन ने तृणमूल सरकार पर भ्रष्टाचार, वसूली (कटमनी) और घुसपैठ को बढ़ावा देने के मुद्दे प्रमुखता से उठाए। उन्होंने सिलीगुड़ी में ट्रेड, कॉमर्स और बिज़नेस प्रोफेशनल्स के साथ संवाद किया और ‘सोनार बांग्ला’ के निर्माण का भाजपा का एजेंडा पेश किया। उन्होंने उत्तरी कोलकाता के बारानगर में रोड शो किया और भद्रलोक (मध्यम वर्ग) को मतदान केंद्रों तक जाने के लिए प्रेरित किया। ध्यान देने वाली बात यह है कि 20 जनवरी 2026 को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद 90 दिनों के भीतर नितिन नवीन के नेतृत्व में बंगाल और असम में भाजपा को बड़ी जीत मिली है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बंगाल में भाजपा की यह नई ‘सोशल इंजीनियरिंग’ केवल चुनावी रणनीति नहीं बल्कि राज्य में दीर्घकालिक राजनीतिक आधार मजबूत करने की कोशिश है।


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