June 8, 2026
Entertainment

लंदन से लौटकर गांवों में खोजी अपनी पहचान, हबीब तनवीर ने लोक कलाकारों को दुनिया के मंच तक पहुंचाया

Returning from London, Habib Tanvir sought his identity in the villages; he brought folk artists to the world stage.

भारतीय थिएटर की बात जब भी होती है, तो हबीब तनवीर का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। विदेश में आधुनिक रंगमंच की पढ़ाई करने के बाद लोगों को लगा कि वह पश्चिमी शैली के थिएटर को आगे बढ़ाने के लिए काम करेंगे, लेकिन उन्होंने अपनी असली ताकत भारत के गांवों और लोक कलाकारों में खोजने में लगा दी। यही सोच उन्हें बाकी रंगकर्मियों से अलग बनाती है। 8 जून 2009 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी बनाई हुई रंग परंपरा आज भी जीवित है

हबीब तनवीर का जन्म 1 सितंबर 1923 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हुआ था। उनका असली नाम हबीब अहमद खान था। बचपन से ही उन्हें कविता और साहित्य में रुचि थी। वे शायरी लिखते थे और ‘तनवीर’ नाम से अपनी रचनाएं प्रकाशित करते थे। बाद में यही नाम उनकी पहचान बन गया और पूरी दुनिया उन्हें हबीब तनवीर के नाम से जानने लगी। उनके पिता चाहते थे कि वे एक बड़े सरकारी अधिकारी बनें, लेकिन हबीब का मन कला और साहित्य में था। उन्होंने पढ़ाई के दौरान ही तय कर लिया था कि उनका जीवन रंगमंच और रचनात्मक दुनिया को समर्पित होगा।

अपने करियर की शुरुआत उन्होंने पत्रकारिता और रेडियो से की। मुंबई पहुंचने के बाद उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं में काम किया और ऑल इंडिया रेडियो से भी जुड़े। इसी दौरान उनका संपर्क इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (आईपीटीए) से हुआ। आईपीटीए उस समय देश में जनवादी रंगमंच का बड़ा आंदोलन था। यहां काम करते हुए हबीब तनवीर ने समझा कि नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने का एक मजबूत साधन भी हो सकता है।

रंगमंच के प्रति अपने जुनून को और मजबूत बनाने के लिए वे 1950 के दशक में लंदन गए। वहां उन्होंने थिएटर की आधुनिक तकनीकों और मंचन की बारीकियों का अध्ययन किया। यूरोप में रहते हुए उन्होंने विश्व रंगमंच को करीब से देखा और सीखा, लेकिन जब वे भारत लौटे तो लोगों को लगा कि उन्होंने एक अलग रास्ता चुना। लेकिन हबीब तनवीर ने महसूस किया कि भारतीय रंगमंच की असली ताकत गांवों, लोक परंपराओं और आम लोगों के जीवन में छिपी हुई है।

रायपुर लौटने के बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोकनाट्य शैली ‘नाचा’ को करीब से देखा। गांवों में साधारण कलाकारों को मंच पर अभिनय करते देखकर वे बेहद प्रभावित हुए। उन्होंने इन कलाकारों में वह प्रतिभा देखी, जिसे बड़े शहरों के मंचों पर शायद कभी मौका नहीं मिला था। इसके बाद उन्होंने गांवों के कलाकारों को अपनी मंडली में शामिल किया और उन्हें लेकर नए प्रयोग शुरू किए।

हबीब तनवीर ने ‘आगरा बाजार’, ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘चरणदास चोर’, ‘पोंगा पंडित’, ‘जिन लाहौर नइ देख्या’ और ‘गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद’ जैसे कई यादगार नाटक बनाए। उनके नाटकों की खास बात यह थी कि उनमें लोकभाषा, लोकगीत, लोकसंगीत और आम लोगों की जिंदगी दिखाई देती थी। ‘चरणदास चोर’ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पाने वाला पहला भारतीय नाटक बना।

उनके योगदान को देखते हुए उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और पद्म विभूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। फ्रांस सरकार ने भी उन्हें अपने बड़े सांस्कृतिक सम्मान से नवाजा। इसके अलावा, वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे और भारतीय रंगमंच को नई दिशा देने में लगातार सक्रिय रहे।

8 जून 2009 को भोपाल में हबीब तनवीर का निधन हो गया।

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