भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी सीपीआई (एम) के महासचिव एम.ए. बेबी ने सोमवार को नई दिल्ली में पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक की। उन्होंने कहा कि फुटबॉल को अक्सर दुनिया का सबसे बड़ा टीम खेल कहा जाता है, जहां अनुशासन, तालमेल और नियमों का सम्मान सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। कोई भी खिलाड़ी कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो, वह अकेले मैच नहीं जीत सकता। जीत के लिए पूरी टीम के बीच भरोसा, सामूहिक प्रयास और एक साझा लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता जरूरी होती है।
सीपीआई(एम) के महासचिव एम.ए. बेबी ने हाल ही में नई दिल्ली में पार्टी की केंद्रीय समिति की बैठक के दौरान साथियों को याद दिलाया कि “फुटबॉल एक टीम गेम है” और प्रगति व्यक्तिगत प्रतिभा से नहीं, बल्कि सामूहिक खेल से हासिल होती है।
यह बात इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि एम.ए. बेबी खुद फुटबॉल के बड़े प्रशंसकों में शामिल रहे हैं। वह कई साल पहले कोलकाता जाकर स्टार फुटबॉलर लियोनेल मेसी को खेलते हुए देखने पहुंचे थे। ऐसे में फुटबॉल का उदाहरण देना केवल एक सामान्य तुलना नहीं था, बल्कि पार्टी के भीतर चल रही बहस के संदर्भ में इसका राजनीतिक महत्व भी देखा जा रहा है।
लेकिन यही तुलना सीपीआई(एम) के सामने खड़े एक अहम सवाल को भी उजागर करती है कि क्या पार्टी स्वयं उन सामूहिक सिद्धांतों का पालन कर रही है, जिनकी वह लगातार वकालत करती रही है?
उन्होंने कहा कि फुटबॉल की दुनिया में मशहूर कहावत “बेंड इट लाइक बेकहम” इंग्लैंड के पूर्व कप्तान डेविड बेकहम की उस असाधारण क्षमता को दर्शाती है, जिसमें वह गेंद को घुमाकर शानदार शॉट लगाते थे, लेकिन खेल के नियमों के भीतर रहते हुए। यह मुहावरा नियमों को तोड़ने का नहीं, बल्कि नियमों को समझते हुए उनमें महारत हासिल करने का प्रतीक बन चुका है लेकिन सीपीआई (एम) के सामने अब एक अलग सवाल खड़ा है। क्या पार्टी अपने ही बनाए नियमों में किसी एक नेता के लिए बदलाव कर रही है?
दिलचस्प बात यह है कि एम.ए. बेबी की फुटबॉल वाली टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब केंद्रीय समिति खुद इस बात पर चर्चा कर रही है कि क्या पार्टी सामूहिक कार्यप्रणाली से दूर होती जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार, कई नेताओं ने चुनावी हार के कारणों में नेतृत्व की कथित कठोर शैली, कार्यकर्ताओं के साथ संवाद की कमी और फैसलों के अत्यधिक केंद्रीकरण को प्रमुख कारण बताया है।
फुटबॉल में सफलता टीमवर्क से मिलती है। राजनीति में, खासकर कम्युनिस्ट राजनीति में लंबे समय से सामूहिक नेतृत्व और संगठन को सबसे अधिक महत्व देने की बात कही जाती रही है। अब सीपीआई (एम) के सामने चुनौती यह है कि वह अपने पुराने सामूहिक मूल्यों को फिर से मजबूत कर पाती है या नहीं। क्या पार्टी के नियम सभी नेताओं के लिए समान रहेंगे या फिर सबसे बड़े नेताओं के लिए अलग तरीके से लागू होंगे। यह सवाल आने वाले समय में पार्टी की दिशा तय कर सकता है।


Leave feedback about this