हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएचपी), धर्मशाला में डॉक्टरेट शोध परियोजना के प्रारंभ होने के साथ ही प्रख्यात स्थानीय लेखिका चंद्ररेखा धडवाल के साहित्यिक योगदान को अकादमिक दृष्टि से महत्व दिया जाएगा। इस अध्ययन का उद्देश्य उनके व्यापक साहित्यिक कार्यों का आलोचनात्मक विश्लेषण करना और भारत की समृद्ध ज्ञान परंपराओं के संदर्भ में उनकी प्रासंगिकता का पता लगाना है।
शाहपुर स्थित गवर्नमेंट कॉलेज की सहायक प्रोफेसर आशा शर्मा, सीयूएचपी के प्रोफेसर चंद्रकांत सिंह के मार्गदर्शन में यह शोध कर रही हैं। “भारतीय ज्ञान प्रणाली के परिप्रेक्ष्य से चंद्ररेखा धडवाल की संपूर्ण साहित्यिक कृतियों का अध्ययन” शीर्षक वाली इस परियोजना का उद्देश्य भारतीय दर्शन, संस्कृति और साहित्यिक चिंतन के परिप्रेक्ष्य से चंद्ररेखा धडवाल की रचनाओं का विश्लेषण करना है।
विश्वविद्यालय के अनुसार, यह शोध चंद्ररेखा की प्रकाशित रचनाओं का व्यापक मूल्यांकन प्रस्तुत करेगा और यह पता लगाएगा कि उनकी रचनाएँ भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों में निहित मूल्यों को किस प्रकार प्रतिबिंबित और सुदृढ़ करती हैं। इस अध्ययन से हिमाचल प्रदेश की जीवंत साहित्यिक विरासत को उजागर करने और क्षेत्रीय साहित्य के अकादमिक दस्तावेज़ीकरण को मजबूत करने की भी उम्मीद है।
चंद्ररेखा धर्मशाला के सरकारी महाविद्यालय में हिंदी विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष हैं और कविता, कथा साहित्य, उपन्यास, निबंध और ग़ज़लों में उनके योगदान के लिए उन्हें व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त है। उनकी प्रशंसित रचनाओं में ‘ जरूरत भर सुविधा’ , ‘शिवने उगड़ती हुई’ और ‘रोशनी के बाबजूद’ कहानी संग्रह , ‘समय मेरे अनुरूप हुआ’ और ‘ आग’ उपन्यास , और हिमाचली कविता संग्रह ‘अख़र-अख़र जुगनू’ शामिल हैं। उन्होंने उर्दू ग़ज़लों का हिमाचली में अनुवाद भी किया है और राज्य की लोक संस्कृति पर पुस्तकें भी लिखी हैं।
शिक्षाविदों का मानना है कि यह शोध न केवल चंद्ररेखा की साहित्यिक विरासत को संरक्षित करेगा बल्कि हिमाचल प्रदेश की समृद्ध साहित्यिक परंपराओं और समकालीन भारतीय साहित्य में क्षेत्रीय आवाजों की स्थायी प्रासंगिकता को व्यापक विद्वतापूर्ण मान्यता भी दिलाएगा।


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