August 18, 2026
National

वंदे मातरम विवाद पर शिवसेना-यूबीटी ने भाजपा की आलोचना की, बेवजह तूल देने का लगाया आरोप

Shiv Sena (UBT) criticized the BJP over the ‘Vande Mataram’ controversy, accusing it of unnecessarily blowing the issue out of proportion.

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने मंगलवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व पर तीखा हमला किया और सत्ताधारी पार्टी पर “बौद्धिक दिवालियापन” और राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर बेवजह राजनीतिक विवाद खड़ा करने का आरोप लगाया। शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र ‘सामना’ में छपे एक तीखे संपादकीय में ठाकरे गुट ने कहा कि भारत की आजादी की लड़ाई, देश के अहम पड़ावों या ‘वंदे मातरम’ और ‘इंकलाब जिंदाबाद’ जैसे मशहूर नारों में भाजपा की कोई ऐतिहासिक भूमिका नहीं रही है।

संपादकीय में भाजपा के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर निशाना साधा गया। मुस्लिम लीग के नेतृत्व वाली बंगाल कैबिनेट में उनकी भागीदारी का जिक्र किया गया और उन पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने ब्रिटिश शासन से आजादी के आंदोलनों (जिसमें ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ भी शामिल था) को सख्ती से दबाने की वकालत की थी।

शिवसेना का तर्क है कि राजनीतिक विरोधियों से माफी मांगने के बजाय भाजपा को आजादी के आंदोलन के साथ ऐतिहासिक रूप से धोखा देने के लिए देश से माफी मांगनी चाहिए। यह हमला संसद की कार्यवाही को लेकर विपक्ष और केंद्र सरकार के बीच बढ़ते तनाव के बीच हुआ है। संपादकीय के अनुसार, कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने हाल ही में संसद में हंगामा किया और जंतर-मंतर पर पैलेट गन से फायरिंग की कथित घटना को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बयान और माफी की मांग की।

संपादकीय में कहा गया है कि गृह मंत्री शाह ने संसद सत्र से किनारा किया और बाद में ‘वंदे मातरम’ पर कांग्रेस के रुख को “बौद्धिक नक्सलवाद” करार देते हुए माफी की मांग की। संपादकीय में कहा गया, “वंदे मातरम को राजनीतिक लड़ाई में घसीटना और विरोधियों पर ‘बौद्धिक नक्सलवाद’ का आरोप लगाना, ऐतिहासिक समझ की कमी और राजनीतिक हताशा को दिखाता है।”

संपादकीय में केंद्र सरकार के दावों का जवाब देने के लिए भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में इस गीत की बड़ी विरासत का जिक्र किया गया। 1896 के कोलकाता अधिवेशन में रहमतुल्ला एम. सयानी की अध्यक्षता में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार वंदे मातरम गाया था। जब ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने इस गीत पर प्रतिबंध लगा दिया और इसे गाने वालों को गिरफ्तार किया, तो कांग्रेस के सदस्यों और वामपंथियों ने ही इसके समर्थन में जेल जाने का रास्ता चुना।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखे एक पत्र में रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह के बाद 1937 में महात्मा गांधी, सरदार वल्लभभाई पटेल, जवाहरलाल नेहरू, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, मौलाना आजाद, गोविंद वल्लभ पंत और आचार्य कृपलानी के नेतृत्व वाली कांग्रेस कार्यसमिति ने सर्वसम्मति से इस गीत के पहले दो छंदों को अपनाया। संपादकीय में कहा गया है कि जवाहरलाल नेहरू के ऐतिहासिक ‘नियति से साक्षात्कार’ भाषण से पहले सुचेता कृपलानी ने संसद के विशेष मध्य रात्रि सत्र में वंदे मातरम गाया था।

ठाकरे गुट ने मौजूदा सरकार द्वारा राष्ट्रीय प्रतीकों और संस्थानों को संभालने के तरीके की भी कड़ी आलोचना की।

संपादकीय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर ऐतिहासिक संसद भवन को बंद करने का आरोप लगाया गया, जहां भारत की आज़ादी की शुरुआत हुई थी और उसकी जगह एक ऐसी इमारत बनाने की बात कही गई जिसे “निजी गुजराती मैरिज हॉल” जैसा बताया गया।

इसके अलावा, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने इस बात पर जोर दिया कि भाजपा के वैचारिक जनक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने आजादी के बाद लगभग 50 वर्षों तक अपने कार्यालयों या शाखाओं पर भारतीय तिरंगा नहीं फहराया।

इतिहास का और उदाहरण देते हुए संपादकीय में 17 नवंबर 1817 को पुणे के शनिवार वाडा में बालाजीपंत नाटू द्वारा मराठा ध्वज को नीचे उतारकर ब्रिटिश यूनियन जैक फहराने की घटना का जिक्र किया गया। इसमें बताया गया कि 15 अगस्त 1947 को ही स्वतंत्रता सेनानी क्रांतिसिंह नाना पाटिल ने ‘वंदे मातरम’ के नारों के बीच उस ऐतिहासिक स्थल पर यूनियन जैक को नीचे उतारा और तिरंगा फहराया।

पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू के पुराने बयानों का जिक्र करते हुए संपादकीय में इस बात पर जोर दिया गया कि ‘वंदे मातरम’ को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर रखा जाना चाहिए। साथ ही, इस बात को दोहराया गया कि आजादी की लड़ाई के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों और कांग्रेस ने हमेशा इस गीत को अपनाया था।

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