August 28, 2026
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फिराक गोरखपुरी: आईसीएस की नौकरी छोड़ी, जेल गए और फिर बने उर्दू के पहले ज्ञानपीठ विजेता

Firaq Gorakhpuri: Quit the ICS job, went to jail, and then became the first Urdu recipient of the Jnanpith Award.

फिराक गोरखपुरी का नाम उर्दू शायरी की दुनिया में बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका असली नाम रघुपति सहाय था और उन्होंने अपनी शायरी से उर्दू गजल को एक नई पहचान दी। उनकी जिंदगी सिर्फ शेर और गजलों तक सीमित नहीं थी। इसमें पढ़ाई में शानदार सफलता, सरकारी नौकरी, देश की आजादी की लड़ाई, जेल, राजनीति और साहित्य का लंबा सफर शामिल था।

उन्होंने आजादी की लड़ाई के लिए अपनी अच्छी-खासी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। उनकी शुरुआती गजलों को मशहूर लेखक प्रेमचंद का साथ भी मिला था।

फिराक गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। उनका परिवार पढ़ा-लिखा और संपन्न था। उनके पिता गोरख प्रसाद खुद साहित्य में रुचि रखते थे और कविता लिखते थे। फिराक ने बचपन से ही उर्दू और फारसी सीखी। आगे चलकर उन्होंने गोरखपुर और इलाहाबाद में अपनी पढ़ाई जारी रखी। पढ़ाई में वह काफी तेज थे। बीए की परीक्षा में उन्होंने पूरे प्रदेश में चौथा स्थान हासिल किया। इसी दौर में साहित्य और शायरी के प्रति उनका लगाव तेजी से बढ़ने लगा।

साल 1916 में, जब फिराक करीब 20 साल के थे और बीए के छात्र थे, उन्होंने अपनी पहली गजल कही। उस समय मशहूर लेखक प्रेमचंद भी गोरखपुर में थे और दोनों के बीच अच्छे संबंध थे। प्रेमचंद ने फिराक की शुरुआती प्रतिभा को पहचाना। उन्होंने उनकी शुरुआती गजलों को आगे पहुंचाने में मदद की और उन्हें ‘जमाना’ पत्रिका के संपादक दयानारायण निगम तक भेजा। यही वह समय था जब फिराक के भीतर का शायर धीरे-धीरे लोगों के सामने आने लगा।

पढ़ाई पूरी करने के बाद फिराक को सरकारी नौकरी मिली। उनका चयन पीसीएस के साथ आईसीएस के लिए भी हुआ। उस समय आईसीएस में जाना बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। यह एक ऐसा करियर था जिसमें अच्छी नौकरी और सम्मान दोनों मिलते थे। लेकिन देश उस समय अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर फिराक ने सरकारी नौकरी छोड़ने का फैसला किया।

आजादी की लड़ाई में शामिल होने की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी। राजनीतिक गतिविधियों के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया और करीब डेढ़ साल जेल में रहना पड़ा। जेल से बाहर आने के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें कांग्रेस के काम से जोड़ा और वह कुछ समय तक कांग्रेस कार्यालय में अवर सचिव रहे।

बाद में फिराक ने राजनीति से अलग होकर शिक्षा और साहित्य को अपना मुख्य रास्ता बनाया। साल 1930 के आसपास वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े और वहां अंग्रेजी साहित्य पढ़ाने लगे। वह हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी तीनों भाषाओं के अच्छे जानकार थे। उनकी शायरी में प्रेम, इंसानी भावनाओं, जिंदगी और समाज की कई तस्वीरें दिखाई देती हैं। उन्होंने गजल के साथ नज्म, रुबाई और दूसरी काव्य विधाओं में भी लिखा।

फिराक की प्रमुख रचनाओं में ‘रूह-ए-कायनात’, ‘गुले-नग्मा’, ‘गुले-राना’, ‘शबनमिस्तान’ और ‘रूप’ जैसी किताबें शामिल हैं। उनकी किताब ‘गुले-नग्मा’ ने उन्हें साहित्य की दुनिया में सबसे ऊंचे मुकाम तक पहुंचाया। इसके लिए उन्हें 1960 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और 1969 में भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। वह उर्दू साहित्य के पहले ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता बने।

साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें 1968 में पद्म भूषण और सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार भी मिला। 1970 में उन्हें साहित्य अकादमी की फेलोशिप दी गई। आगे चलकर उन्हें गालिब अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। उनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद हुआ, और उनकी शायरी ने उर्दू साहित्य में अपनी अलग जगह बनाई।

फिराक गोरखपुरी का निधन 3 मार्च 1982 को नई दिल्ली में हुआ। वह करीब 85 साल के थे। उनके जाने के बाद भी उनकी शायरी लोगों के बीच बनी रही।

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