जीएमएडीए द्वारा भूखंड खरीदार को किसी भी प्रकार का अदालती मामला दायर न करने या कोई अन्य कार्रवाई न करने का वचन देने की शर्त लगाने पर हैरानी जताने के दो सप्ताह से भी कम समय के भीतर, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने अब प्राधिकरण के मुख्य प्रशासक को एक हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है, जिसमें यह स्पष्ट करना होगा कि पिछले पांच वर्षों में इस तरह की शर्त के साथ कितने मांग नोटिस जारी किए गए थे।
यह निर्देश न्यायमूर्ति जसगुरप्रीत सिंह पुरी और न्यायमूर्ति प्रविन्द्र सिंह चौहान की खंडपीठ द्वारा याचिका के दायरे को विस्तारित करने के तुरंत बाद आया, जब उन्हें बताया गया कि जीएमएडीए द्वारा जारी किए गए प्रत्येक मांग पत्र में किसी व्यक्ति को कोई भी मामला दर्ज न करने का वचन देने की शर्त लगाई जा रही थी।
अपने नवीनतम आदेश में, पीठ ने दर्ज किया कि प्रतिवादी-जीएमएडीए की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह गरचा ने कहा कि मुख्य प्रशासक को रिकॉर्ड के आधार पर हलफनामा दाखिल करने के लिए कुछ और समय की आवश्यकता है।
गरचा ने आठ सप्ताह का समय मांगा, लेकिन पीठ ने चार सप्ताह का समय दिया। अदालत ने कहा, “पिछले आदेश के अनुसार हलफनामा दाखिल करने के लिए मुख्य प्रशासक को चार सप्ताह का समय देना उचित होगा,” और मामले को 28 अक्टूबर तक के लिए स्थगित कर दिया।
“यदि राज्य का कोई विभाग, विशेष रूप से आवास विभाग, किसी मांग नोटिस में यह शर्त लगाता है कि संबंधित व्यक्ति की शिकायत पर तभी विचार किया जाएगा जब वह एक हलफनामा प्रस्तुत करे जिसमें यह कहा गया हो कि वह किसी भी न्यायालय में कोई मामला दायर नहीं करेगा या कोई अन्य कार्रवाई नहीं करेगा, तो यह प्रथम दृष्टया घृणित प्रकृति का है, साथ ही असंवैधानिक और भारतीय अनुबंध अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन भी है,” न्यायालय ने टिप्पणी की थी।
यह निर्देश पंजाब राज्य और अन्य प्रतिवादियों के खिलाफ संपत्ति मालिक द्वारा वकील रुबल गर्ग के माध्यम से दायर याचिका पर पारित किए गए। याचिकाकर्ता ने मोहाली के एसएएस नगर स्थित जीएमएडीए के एस्टेट ऑफिसर के 11 अक्टूबर, 2024 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जो सेक्टर 69 मोहाली में स्थित एक प्लॉट से संबंधित था।
आदेश में यह शर्त रखी गई थी कि याचिकाकर्ता को एक हलफनामा प्रस्तुत करना होगा जिसमें यह कहा गया हो कि वह पुनरीक्षण याचिका के आदेशों या निर्माण शुल्क की माफी के विरुद्ध कोई भी अदालती मामला दायर नहीं करेगा या कोई अन्य कार्रवाई नहीं करेगा। आदेश में लिखा था, “इसके बाद ही उक्त भूखंड का स्वामित्व आपके नाम पर हस्तांतरित करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।”
पिछली सुनवाई में प्रतिवादी-जीएमएडीए की ओर से बेंच के समक्ष उपस्थित हुए गरचा ने बताया कि विवादित आदेश में लगाई गई शर्त वापस ले ली गई है। दूसरी ओर, गरचा ने यह भी बताया कि ऐसी शर्त लगाने वाला अनुच्छेद कोई अलग मामला नहीं था। यह केवल वर्तमान याचिकाकर्ता से संबंधित नहीं था, बल्कि ऐसी शर्त हर मांग पत्र में लगाई जा रही थी।
“अतः, यदि याचिकाकर्ता के वकील द्वारा प्रस्तुत दलील सही साबित होती है, तो हमारे पास इस पर गंभीरता से विचार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है… अतः, हम भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए इस याचिका के दायरे को विस्तारित करना उचित समझते हैं। जीएमएडीए के मुख्य प्रशासक को निर्देश दिया जाता है कि वे आज से एक सप्ताह के भीतर अपना हलफनामा दाखिल करें, जिसमें यह बताया जाए कि पिछले पांच वर्षों में जारी किए गए कितने मांग नोटिसों में भारत के लोगों पर ऐसी शर्त लगाई गई है,” पीठ ने टिप्पणी की थी।


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