विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने विकास-उन्मुख बहुपक्षवाद की आवश्यकता और ग्लोबल साउथ की भूमिका बढ़ाने के सामूहिक प्रयास पर बल दिया। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के 81वें सत्र से इतर विदेश मंत्रियों की ग्रुप ऑफ 77 बैठक में उन्होंने भारत का पक्ष रखा।
विदेश मंत्रालय (एमईए) प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उनकी पोस्ट को री शेयर करते हुए इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ‘ग्रुप ऑफ 77’ के विदेश मंत्रियों की 50वीं सालाना बैठक में विदेश सचिव ने भारत का पक्ष रखा। इस बैठक का विषय “ग्लोबल साउथ और मल्टीलेटरलिज्म (बहुपक्षवाद) का भविष्य” था।
बैठक में मिस्री ने जन केंद्रित और विकास-उन्मुख बहुपक्षवाद को आगे बढ़ाने में जी77 की लगातार अहमियत पर जोर दिया। साथ ही, विकासशील देशों की आवाज और प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए यूएनएससी में सुधार की तत्काल जरूरत को रेखांकित किया। उन्होंने ग्लोबल साउथ को लेकर भारत की स्पष्ट सोच के अनुसार ग्लोबल साउथ को ‘रूल टेकर्स’ (नियम मानने वालों) से ‘रूल शेपर्स’ (नियम बनाने वालों) की भूमिका में लाने के लिए सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया।
ग्रुप ऑफ 77 (जी77) (आधिकारिक साइट पर दी गई जानकारी के अनुसार) संयुक्त राष्ट्र में विकासशील देशों का सबसे बड़ा अंतर-सरकारी गठबंधन माना जात है। इसकी स्थापना 15 जून 1964 को जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन (यूएनसीटीएडी) के दौरान 77 संस्थापक देशों ने मिलकर किया था। हालांकि इसका नाम ‘ग्रुप ऑफ 77’ है, लेकिन समय के साथ इसमें और भी देश शामिल होते गए। अब इसमें 134 सदस्य देश शामिल हैं। हालांकि ऐतिहासिक महत्व की वजह से इसका मूल नाम नहीं बदला गया है। भारत इसके संस्थापक सदस्यों में से एक है।
10-25 अक्टूबर 1967 को अल्जीयर्स (अल्जीरिया) में ‘ग्रुप ऑफ 77’ की पहली मंत्री-स्तरीय बैठक हुई थी, जिसमें ‘अल्जीयर्स चार्टर’ को अपनाया गया। इसके बाद धीरे-धीरे एक स्थायी संस्थागत ढांचा विकसित हुआ, जिसके तहत जिनेवा (यूएनसीटीएडी), नैरोबी (यूएनईपी), पेरिस (यूनेस्को), रोम (एफएओ), और वियना (यूएनआईडीओ) में ‘ग्रुप ऑफ 77’ के चैप्टर और संपर्क कार्यालय तथा वाशिंगटन डी.सी. (आईएमएफ और विश्व बैंक) में ‘ग्रुप ऑफ 24’ (जी24) की स्थापना हुई।


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