झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 2018 में गुमला जिले से लापता हुई बच्ची का अब तक पता नहीं चलने और मामले की जांच में कथित लापरवाही पर पुलिस तथा राज्य सरकार के रवैये को लेकर कड़ी नाराजगी जताई है।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ ने सवाल किया कि वर्ष 2018 से 2022 के बीच गुमला में पदस्थापित तत्कालीन पुलिस अधीक्षकों और जांचकर्ताओं को किस आधार पर क्लीन चिट दे दी गई, जबकि जांच की निर्धारित अवधि की रिपोर्ट जिला विधिक सेवा प्राधिकार (डीएलएसए) को समय पर नहीं भेजी गई थी।
अदालत ने गृह विभाग को इस संबंध में नया शपथ पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दाखिल शपथ पत्र में स्वीकार किया गया कि लापता बच्ची के मामले में जांच की पीरियॉडिकल रिपोर्ट गुमला डीएलएसए को काफी विलंब से, 23 अक्टूबर 2026 को भेजी गई। सरकार की ओर से इस देरी के लिए अदालत से बिना शर्त माफी भी मांगी गई।
वहीं, प्रार्थी की ओर से पेश अधिवक्ता ने आरोप लगाया कि सरकार ने पूर्व के अधिकारियों को बचाने की कोशिश की है और अदालत के सामने सही तथ्य नहीं रखे गए हैं। मामले में मुख्य आरोपी भूखली लकड़ा को 6 जून 2026 को गिरफ्तार किया गया था। गुजरात के गांधीनगर में उसका सस्पेक्ट डिटेक्शन टेस्ट कराया गया, जिसमें वह संदिग्ध पाई गई।
हालांकि, गिरफ्तारी के कई दिनों बाद पुलिस कस्टडी के लिए आवेदन दिए जाने पर अदालत ने सवाल उठाए और जांच की प्रक्रिया में देरी पर नाराजगी जताई। खंडपीठ ने गुमला के पुलिस अधीक्षक से भी जवाब मांगा है कि जांच में इतनी देरी और लापरवाही क्यों हुई तथा इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है।
गौरतलब है कि गुमला से वर्ष 2018 में लापता हुई बच्ची की मां चंद्रमुनि उराइन ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। बच्ची के लापता होने के समय उसकी उम्र छह वर्ष थी। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत पहले भी पुलिस की जांच पर असंतोष जता चुकी है और बच्ची का पता लगाने में विफल रहने पर जांच सीबीआई को सौंपने की चेतावनी दे चुकी है।


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