February 12, 2026
Entertainment

5 रुपए के इनाम से शुरू हुआ सफर, पार्वती घोष की वह कहानी, जिसने ओडिया सिनेमा को नई दिशा दी

A journey that began with a prize of Rs 5: Parvati Ghosh’s story that shaped Odia cinema

12 फरवरी । अपने आप में एक बहुत टैलेंटेड अभिनेत्री, ऐसी यादगार और दमदार परफॉर्मेंस, जो बड़े-बड़े कलाकारों से कम नहीं थी। उन्होंने बहुत हिम्मत दिखाई, अपनी मुश्किलों को पार किया और उनके गुजर जाने के बाद भी प्रोडक्शन हाउस को आगे बढ़ाया।। बात हो रही है कि ओडिशा की पहली महिला फिल्म निर्माता पार्वती घोष की।

28 मार्च 1942 को ओडिशा के कटक जिले में जन्मी पार्वती घोष बहुत छोटी उम्र से ही कई सामाजिक कार्यों और रवींद्र जयंती जैसे राजकीय समारोहों में भाग लेती थीं। उन्हें अपने पैशन को पूरा करने के लिए माता-पिता से बहुत सपोर्ट मिला। एक्टिंग के लिए उनका शौक सबसे पहले स्कूल में जगा, जहां उन्होंने कई कल्चरल और सोशल एक्टिविटीज में हिस्सा लिया। कुछ लेखों में उल्लेख है कि पार्वती घोष ने स्कूल में एक कविता पाठ में 5 रुपए का अपना पहला अवार्ड जीता। उनके टीचर उन्हें बहुत पसंद करते थे और उन्हें अपना टैलेंट दिखाने के लिए प्रोत्साहित करते थे। सालों बाद उन्होंने उन्हें अपने डायमंड जुबली सेलिब्रेशन में चीफ गेस्ट के तौर पर सम्मानित किया।

बहुत कम उम्र से ही उन्होंने कई सोशल कामों और रवींद्र जयंती जैसे सरकारी कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। वे बाल कलाकार के रूप में ऑल इंडिया रेडियो और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सोशल और कल्चरल प्रोग्राम में शामिल हो गईं। जल्द ही उन्हें 1949 में फिल्म ‘श्री जगन्नाथ’ के लिए मशहूर सिंगर धीरेन दास ने चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर अपना पहला ऑनस्क्रीन रोल ऑफर किया।

उनका स्वभाव अच्छा और मददगार था और मोहल्ले में उन्हें प्यार से चपला रानी के नाम से जाना जाता था। 1953 में उन्हें नरेन मित्रा की प्रोड्यूस की हुई ‘अमारी गान झुआ’ फिल्म में लीड रोल ऑफर हुआ। उन्होंने अपने अभिनय से सभी का दिल जीत लिया। 1956 में फिल्म ‘भाई भाई’ ने उन्हें न सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री से बल्कि पॉलिटिकल और सोशल सर्कल से भी कुछ असरदार लोगों के कॉन्टैक्ट में आने का मौका दिया।

उनका अगला लीड रोल 1959 में आई फिल्म ‘मां’ में था। यह साल इसलिए खास बन गया क्योंकि उन्होंने गौर घोष से शादी की और पार्वती घोष बन गईं। पढ़ने का शौक रखने वाली और जल्दी सीखने वाली होने के कारण, उन्होंने बहुत मेहनत की और घोष परिवार में शादी के बाद बंगाली भाषा में काफी माहिर हो गईं। इससे उन्हें कई बेहतरीन बंगाली साहित्यिक रचनाएं पढ़ने का मौका मिला।

पार्वती घोष ने गौर घोष के साथ मिलकर सिनेमा में इतिहास रचा, लगातार सफल और अवॉर्ड जीतने वाली फिल्में बनाईं।

फिल्म ‘संसार’ के बाद पति-पत्नी ने फकीर मोहन सेनापति के एपिक नॉवेल ‘छा माना अथा गुंथा’ के सिनेमाई वर्जन की घोषणा की। यह जमींदारों की ओर से गांव वालों के शोषण की एक दिल को छू लेने वाली कहानी थी। अनजाने में कुछ अनचाही वजहों से इस काम में देरी हो गई। हालांकि, वह 1986 में इस प्रोजेक्ट को फिर से शुरू करने में कामयाब रहीं और इसे खुद प्रोड्यूस और डायरेक्ट किया, जिसके लिए उन्हें खूब तारीफें मिलीं।

हालांकि, उन्होंने फिल्म जगत से कुछ सालों के बाद संन्यास ले लिया था, फिर भी वह अक्सर सामाजिक और स्वैच्छिक कार्यों के लिए सामने आती थीं। उन्हें उनके विशाल योगदान के लिए कई बार सम्मानित किया गया और प्रतिष्ठित संगठनों की ओर से उन्हें कई लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार दिए गए। उन्होंने 12 फरवरी 2018 को अंतिम सांस ली और ओडिया फिल्म उद्योग में अपनी छाप व विरासत छोड़ गईं।

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