गुजरात के गांधीनगर स्थित रूपाल गांव में एक बार फिर आस्था का विराट नजारा देखने को मिला। नवरात्रि की नवमी के पावन अवसर पर मां वरदायिनी की पल्ली निकली, जिसमें लाखों श्रद्धालुओं ने दर्शन किए और पल्ली पर शुद्ध घी चढ़ाकर मन्नतें मांगीं।
रूपाल की पल्ली की विशेषता केवल घी चढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पल्ली तैयार करने से लेकर उसकी सेवा और पल्ली निकलने के बाद सड़क पर एकत्र घी को घर ले जाने तक वाल्मीकि समाज की परंपरागत भूमिका भी महत्वपूर्ण है। पांडवकाल से जुड़ी लोकमान्यता और अठारह आलम की सामूहिक भागीदारी रूपाल की पल्ली को विशिष्ट बनाती है।
नवमी पर गुजरात के गांधीनगर स्थित रूपाल गांव में निकलने वाली मां वरदायिनी की पल्ली का नाम प्रसिद्ध है। वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, आश्विन शुक्ल नवमी के दिन रूपाल में मां वरदायिनी की पल्ली निकाली जाती है। खेजड़े की लकड़ी से तैयार होने वाला यह पल्लीरथ केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि गांव के अठारह आलम की एकता और सामूहिक संस्कृति का भी प्रतीक है।
पल्ली तैयार करने में गांव के विभिन्न समाजों के लोग अपनी पारंपरिक सेवाएं देते हैं। हर समाज की अपनी अलग भूमिका होती है, जो इस परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनाए हुए हैं। पल्ली तैयार होने के बाद विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है और फिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी पल्ली यात्रा शुरू होती है।
लोकमान्यता के अनुसार, पांडव अपने 12 वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास के दौरान रूपाल के जंगलों में आए थे। कहा जाता है कि बरखेड़ा के वृक्ष के नीचे पांडवों ने अपने शस्त्र छिपाए थे। शस्त्रों की रक्षा के लिए उन्होंने मां वरदायिनी की प्रार्थना की थी। युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद पांडवों, भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी ने मां के सम्मान में सोने की पल्ली बनवाई थी। इसी मान्यता के साथ आश्विन शुक्ल नवमी के दिन पल्ली यात्रा निकालने की परंपरा जुड़ी हुई है।
श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर मां वरदायिनी की पल्ली पर घी चढ़ाकर आभार व्यक्त करते हैं। इसके लिए गुजरात के विभिन्न क्षेत्रों सहित दूर-दराज से भक्त घी के पीपे और बर्तन लेकर रूपाल पहुंचते हैं।
पल्ली गांव के अलग-अलग चौक और गलियों से होकर गुजरती है। इस दौरान श्रद्धालु पल्ली पर घी चढ़ाते हैं और मां के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। यहां बच्चे के जन्म के बाद मां के दर्शन कराने की भी विशेष मान्यता है। महिलाएं सिर पर घड़ुलिया लेकर गरबा करती हैं, जबकि युवा पल्ली को एक चौक से दूसरे चौक तक लेकर जाते हैं।
रूपाल की पल्ली से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण परंपरा वाल्मीकि समाज की सेवा से संबंधित है। पल्ली पर घी चढ़ाने के बाद सड़कों पर एकत्र हुए घी को वाल्मीकि समाज के लोग इकट्ठा करते हैं और उसे अपने घर ले जाते हैं। यह प्रक्रिया पल्ली से जुड़ी पारंपरिक व्यवस्थाओं का एक हिस्सा है।
पल्ली की तैयारियों से लेकर यात्रा और उसके बाद की व्यवस्था तक गांव के विभिन्न समाज अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। इसी क्रम में वाल्मीकि समाज की भागीदारी भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण मानी जाती है। जैसे-जैसे पल्ली रूपाल की गलियों से होकर आगे बढ़ती है, श्रद्धालु उस पर घी चढ़ाते जाते हैं। देखते ही देखते सड़कों पर घी बहता नजर आता है और कई जगह घी की नदियों जैसा दृश्य दिखाई देता है।
बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां वरदायिनी के दर्शन के लिए उमड़ते हैं। मां के जयकारों से पूरा रूपाल भक्तिमय हो जाता है। कोई घी चढ़ाकर अपनी मन्नत पूरी करता है तो कोई पल्ली के दर्शन कर मां का आशीर्वाद प्राप्त करता है। श्रद्धालुओं की यही अटूट आस्था रूपाल की पल्ली को गुजरात की विशिष्ट धार्मिक परंपराओं में शामिल करती है।
रूपाल की पल्ली की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक गांव के विभिन्न समाजों की सामूहिक भागीदारी है। वाल्मीकि, नाई, कुम्हार, पिंजारा, पांचाल, माली और ब्राह्मण समाज सहित विभिन्न समुदायों का योगदान इस परंपरा की विशिष्ट पहचान है। यही वजह है कि रूपाल की पल्ली धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक एकता, आपसी सहयोग और सर्वधर्म समभाव का भी संदेश देती है।
सुथार समुदाय के एक कारीगर ने आईएएनएस से कहा, “रूपाल गांव गांधीनगर जिले में स्थित है। इस गांव में वरदायिनी माता का मंदिर है।”

