January 20, 2026
National

अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती कोई शंकराचार्य नहीं, वे समाज के साथ कर रहे छल : स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती

Avimukteshwarananda Saraswati is not a Shankaracharya, he is deceiving the society: Swami Jitendrananda Saraswati

प्रयागराज माघ मेले में स्नान को लेकर विवादों में आए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती कभी शंकराचार्य नहीं थे। वे सिर्फ नकारात्मक प्रचार के जरिए समाज के साथ छल करने का काम कर रहे हैं।

समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा, “अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती 2020 में 2013-14 की वसीयत लेकर आए थे। 2020 में उनके अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के गुरु (शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती) ने अपना उत्तराधिकारी बनाने से साफ इनकार किया था। उन्होंने वसीयत लिखने से भी साफ इनकार किया था।”

उन्होंने कहा कि अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अपनी योग्यता को आधार बनाया और परंपरा को नकारकर कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। वे परंपरा को स्वीकार नहीं कर सकते थे और इसीलिए वसीयत नहीं लिख सकते थे। हाईकोर्ट ने गलत ठहराया था और सुप्रीम कोर्ट से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली थी।

स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई का जिक्र करते हुए कहा, “अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक पर पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती के शपथपत्र के कारण प्रतिबंध लगा। आजीवन अविमुक्तेश्वरानंद का पट्टाभिषेक नहीं हो सकता है।”

अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से पट्टाभिषेक के दावों पर भी स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “पट्टाभिषेक सिंहासन पर बैठाकर होता है। अविमुक्तेश्वरानंद अपने गुरु की 13वीं करके पहुंचे थे और उस समय किसी शंकराचार्य ने दूर से जल छिड़क दिया था, लेकिन आप कह रहे हैं कि अभिषेक हो गया। यह गलत बयानबाजी है।”

स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने अविमुक्तेश्वरानंद पर कानून के साथ खिलवाड़ करने के भी आरोप लगाए। उन्होंने पूछा, “देश के अखाड़ों, संन्यासियों या किसी प्रतिष्ठित संत ने अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य नहीं माना। उन्हें किसी कार्यक्रम में नहीं बुलाया गया।”

इसी बीच, स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने पंडित धीरेंद्र शास्त्री के ‘तिरंगे’ वाले बयान का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि भारत के विभाजन का आधार सिर्फ धर्म था। अखंड भारत में सिर्फ 23 प्रतिशत मुसलमान थे, तब उन्होंने अलग देश बना लिया। आज भी ‘गजबा-ए-हिंद’ पर वे काम कर रहे हैं। इन परिस्थितियों में धीरेंद्र शास्त्री का बयान बिल्कुल सही है।

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