N1Live Entertainment बर्थडे स्पेशल : 10 साल की उम्र में अकेले ट्रेन से संगीत सुनने निकल पड़ते थे लालगुडी जयरामन, ऐसे बने वायलिन के उस्ताद
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बर्थडे स्पेशल : 10 साल की उम्र में अकेले ट्रेन से संगीत सुनने निकल पड़ते थे लालगुडी जयरामन, ऐसे बने वायलिन के उस्ताद

लालगुडी जयरामन का नाम कर्नाटक संगीत और वायलिन की दुनिया में बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने वायलिन को सिर्फ एक वाद्य यंत्र की तरह नहीं बजाया, बल्कि उसकी आवाज में गायकी जैसा भाव पैदा किए। उन्होंने देश-विदेश के बड़े मंचों पर पहचान बनाई, लेकिन बचपन में संगीत सुनना उनके लिए आसान नहीं था। उनके घर में रेडियो तक नहीं था। संगीत सुनने की ऐसी लगन थी कि वह करीब 10 साल की उम्र में अकेले ट्रेन से कॉन्सर्ट सुनने निकल पड़ते थे।

लालगुडी जयरामन का जन्म 17 सितंबर 1930 को हुआ था। उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ, जिसका कई पीढ़ियों से कर्नाटक संगीत से गहरा जुड़ाव था। उनके पिता लालगुडी वी.आर. गोपाला अय्यर खुद मशहूर संगीतकार और उनके गुरु थे। पिता ने उन्हें बहुत छोटी उम्र से ही संगीत की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी थी। जयरामन के लिए वायलिन उनकी रोज की जिंदगी का हिस्सा बन गया था।

बचपन में उनका परिवार तमिलनाडु के लालगुडी इलाके में रहा और यहीं उन्होंने लंबे समय तक रियाज किया। एक इंटरव्यू में उन्होंने बचपन को याद करते हुए बताया था कि उस समय उनके घर में रेडियो नहीं था। वह आसपास के लोगों के घर जाकर या सार्वजनिक जगहों पर लगे रेडियो पर शाम के ऑल इंडिया रेडियो के संगीत कार्यक्रम सुनते थे। उनके लिए यह सीखने का एक तरीका था। जो कुछ वह सुनते, उसे याद रखने की कोशिश करते और घर लौटकर वायलिन पर उसी धुन को निकालने बैठ जाते।

जयरामन ने एक इंटरव्यू में बताया था कि अगर कोई कार्यक्रम रात करीब 9 बजे खत्म होता, तो वह तेजी से घर लौटते और फिर घंटों वायलिन पर सुनी हुई चीजों को दोहराते थे। उन्होंने अपने गांव की शांति को भी अपनी ट्रेनिंग के लिए बहुत जरूरी बताया था। वहां शोर कम था, इसलिए वह लंबे समय तक रियाज कर सकते थे। उनका संगीत के प्रति जुनून इतना ज्यादा था कि करीब 10 साल की उम्र में वह अकेले ट्रेन से कॉन्सर्ट सुनने तक चले जाते थे।

जयरामन ने बहुत कम उम्र में बड़े कलाकारों के साथ वायलिन बजाना शुरू कर दिया था। उन्होंने मदुरै मणि अय्यर और जी.एन. बालासुब्रमण्यम जैसे बड़े गायकों के साथ काम किया। उन्होंने खुद बताया था कि बचपन में सुने और सीखे गीतों की वजह से उन्हें कलाकारों की गायकी और रचनाओं को समझने में मदद मिलती थी।

आगे चलकर लालगुडी जयरामन ने वायलिन बजाने का अपना अलग अंदाज बनाया, जिसे बाद में ‘लालगुडी बानी’ के नाम से जाना गया। उनकी खासियत थी कि उनकी वायलिन की धुन में गायकी जैसा भाव सुनाई देता था। वह राग, ताल और शब्दों के भाव को वायलिन पर इस तरह पेश करते थे कि सुनने वाले को संगीत में कहानी भी महसूस होती थी।

जयरामन की प्रतिभा सिर्फ वायलिन बजाने तक नहीं थी। उन्होंने खुद भी कई रचनाएं तैयार कीं। उन्होंने वर्णम, तिल्लाना और दूसरी रचनाओं के अलावा ‘सुलादी सप्त ताल रामायण’ जैसी बड़ी रचना भी तैयार की। वह शिक्षक भी रहे और उन्होंने कई कलाकारों को संगीत सिखाया। उनके बेटे लालगुडी जी.जे.आर. कृष्णन और बेटी लालगुडी विजयलक्ष्मी ने भी वायलिन की इसी परंपरा को आगे बढ़ाया।

उनकी कला को देश और विदेश में खूब सम्मान मिला। भारत सरकार ने उन्हें 1972 में पद्म श्री और 2001 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। उन्हें 1978 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। 2009 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी का फेलो चुना गया, जिसे अकादमी का बड़ा सम्मान माना जाता है। 2008 में म्यूजिक अकादमी, मद्रास ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान भी दिया।

2006 में स्ट्रोक के बाद उन्होंने मंच से दूरी बना ली, लेकिन संगीत से उनका रिश्ता नहीं टूटा। वह शिक्षक और कंपोजर के रूप में सक्रिय रहे। 22 अप्रैल 2013 को 82 साल की उम्र में लालगुडी जयरामन का निधन हो गया।

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