चंडीगढ़ स्थित सीबीआई कोर्ट ने निलंबित पंजाब पुलिस डीआईजी हरचरण सिंह भुल्लर और उनके करीबी सहयोगी किरशानु शारदा की उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने पिछले साल सीबीआई द्वारा दर्ज भ्रष्टाचार मामले में संज्ञान लेने के आदेश को वापस लेने की मांग की थी।
13 मार्च को सीबीआई अदालत ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए पाया कि रिश्वत की मांग, स्वीकृति और बरामदगी, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और गवाहों के सहायक बयानों से प्रथम दृष्टया आरोपियों के बीच रची गई आपराधिक साजिश साबित होती है। अदालत ने कहा कि दोनों आरोपियों ने आपस में साजिश रची और “गलत काम और लापरवाही” की। इसलिए, प्रथम दृष्टया, उन्हें बीएनएस, 2023 की धारा 61(2) और 2018 में संशोधित पीसी अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 12 के तहत दंडनीय अपराधों और उनसे संबंधित मूल अपराधों का दोषी पाया गया।
निलंबित डीआईजी के वकील एसपीएस भुल्लर ने संज्ञान आदेश का विरोध करते हुए तर्क दिया कि यह आदेश अपूर्ण आरोपपत्र के बावजूद पारित किया गया था, क्योंकि सीएफएसएल रिपोर्ट के दस्तावेज अभी तक उपलब्ध नहीं कराए गए थे। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अभियोजन दस्तावेजों की प्रतियां अभी भी आरोपियों को उपलब्ध कराई जा रही हैं, इसलिए मामले में आरोप तय करने की तारीख भी तय नहीं की गई है।
हालांकि, सीबीआई के लोक अभियोजक ने आवेदन का विरोध किया। दलीलें सुनने के बाद अदालत ने याचिका खारिज कर दी। सीबीआई ने शिकायतकर्ता आकाश बट्टा की 11 सितंबर, 2025 की लिखित शिकायत के आधार पर पंजाब पुलिस के रोपड़ रेंज के तत्कालीन डीआईजी भुल्लर और उसके साथी किरशानु को 16 अक्टूबर, 2025 को गिरफ्तार किया था।
बट्टा ने आरोप लगाया कि डीआईजी के करीबी किरशानु ने उनसे मुलाकात की और सरहिंद पुलिस स्टेशन में उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को निपटाने के लिए और उन्हें अपना स्क्रैप डीलिंग का कारोबार चलाने की अनुमति देने के लिए मासिक भुगतान के रूप में 8 लाख रुपये की मांग की।


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