March 7, 2026
Entertainment

पुण्यतिथि विशेष: पिता की मदद के लिए बने इलेक्ट्रीशियन, संघर्ष से शुरू सफर ने बनाया ‘संगीत का रवि’

Death Anniversary Special: Became an electrician to help his father, a journey that began with struggle made him ‘Ravi of Music’

प्रसिद्धि पाना या नाम कमाना जिंदगी से काफी कुछ मांगता है। संगीत के क्षेत्र में कई कलाकार ऐसे हुए, जिन्होंने गरीबी, संघर्ष और मेहनत के बल पर ऊंचाइयों को छुआ और दुनिया भर में अपनी खास पहचान बनाई। ऐसे ही एक पैदाइशी संगीतकार थे रवि शंकर शर्मा, जो मनोरंजन जगत में रवि के नाम से लोकप्रिय हैं।

खास बात है कि रवि ने कभी औपचारिक शास्त्रीय शिक्षा नहीं ली, लेकिन पिता के भजन सुनकर सुरों का ज्ञान हासिल किया। बचपन से ही हारमोनियम खुद बजाना सीख लिया और कई वाद्ययंत्रों को बजाने में माहिर हो गए। संगीत जगत में उनका मन हमेशा से रमा रहा, लेकिन परिवार की आर्थिक तंगी के कारण पिता की मदद के लिए वह दिल्ली में इलेक्ट्रीशियन का काम करने पर भी मजबूर हो गए, लेकिन मन हमेशा संगीत में लगा रहा।

रवि का सफर संघर्ष से भरा था, लेकिन उनकी मेहनत और लगन ने उन्हें हिंदी सिनेमा के यादगार संगीतकारों में शुमार कर दिया। 3 मार्च 1926 को दिल्ली में जन्मे रवि का सपना था प्लेबैक सिंगर बनना और फिल्म संगीत में नाम कमाना। साल 1950 में आंखों में सपने लिए वे मुंबई पहुंचे। शुरुआत आसान नहीं, बेहद कठिन थी। उनके पास कोई ठिकाना नहीं, दिनभर स्टूडियो के चक्कर लगाते और रातें मलाड रेलवे स्टेशन पर सोकर काटतीं। दो साल तक यह संघर्ष ऐसे ही चला, लेकिन रवि ने कभी हिम्मत कभी नहीं हारी।

मेहनत का परिणाम था कि साल 1952 में किस्मत ने पलटी मारी, और इसी क्रम में उनकी मुलाकात संगीतकार हेमंत कुमार से हुई और फिल्म ‘आनंद मठ’ में ‘वंदे मातरम’ के कोरस गाने का मौका मिला। यहीं से उनकी संगीतकार के रूप में यात्रा शुरू हुई। छोटी शुरुआत ने बड़ी सफलता दिलाई।

साल 1955 में पहली फिल्म ‘अलबेली’ से संगीत निर्देशन उन्होंने शुरू किया। इसके बाद ‘वचन’, ‘नरसी भगत’, ‘दिल्ली का ठग’, ‘दुल्हन’, ‘घर संसार’, ‘मेहंदी’, ‘चिराग कहां रोशनी कहां’, ‘नई राहें’, ‘पहली रात’, ‘अपना घर’, ‘आंचल’ और सबसे प्रसिद्ध ‘चौदहवीं का चांद’ जैसी फिल्मों में उनका जादुई संगीत छाया।

रवि की सबसे बड़ी खासियत थी कि वे पहले गीत लिखवाते थे, फिर उसे संगीतबद्ध करते थे। इसी कारण उनके गीत बेहद कर्णप्रिय और यादगार बने। ‘चौदहवीं का चांद’ के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड नॉमिनेशन भी मिला। 1961 में ‘घराना’ और 1965 में ‘खानदान’ के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले। अन्य सफल फिल्मों में ‘नजराना’, ‘प्यार का सागर’, ‘मॉडर्न गर्ल’, ‘सलाम मेम साहब’, ‘टावर हाउस’, ‘चाइना टाउन’, ‘आज और कल’, ‘गहरा दाग’, ‘गुमराह’, ‘भरोसा’, ‘शहनाई’, ‘काजल’, ‘वक्त’, ‘दो बदन’, ‘औरत’, ‘हमराज’, ‘आंखें’, ‘दो कलियां’, ‘नील कमल’, ‘आदमी और इंसान’, ‘अनमोल मोती’, ‘बड़ी दीदी’, ‘डोली’, ‘एक फूल दो माली’, ‘धड़कन’, ‘धुंध’, ‘एक महल हो सपनों का’, ‘अमानत’ और ‘आदमी सड़क का’ शामिल हैं।

महेंद्र कपूर के ज्यादातर हिट गाने रवि ने ही दिए। उन्होंने 50 से ज्यादा हिंदी फिल्मों में संगीत दिया। 1970 से 1982 तक फिल्म संगीत से ब्रेक लिया, लेकिन 1982 में बी.आर. चोपड़ा की ‘निकाह’ से जबरदस्त वापसी की। इसके बाद 1984 से 2005 तक मलयालम फिल्मों में ‘बॉम्बे रवि’ के नाम से संगीत दिया।

7 मार्च 2012 को मुंबई में उनका निधन हो गया।

Leave feedback about this

  • Service