जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपदाओं और उभरते रासायनिक, जैविक, रेडियोलॉजिकल और परमाणु (सीबीआरएन) जोखिमों से प्रभावी ढंग से निपटने की रणनीतियों पर हिमाचल प्रदेश में अंतर-क्षेत्रीय कार्रवाई के माध्यम से जलवायु परिवर्तन और सीबीआरएन जोखिम न्यूनीकरण को क्रियान्वित करना शीर्षक से आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में विचार-विमर्श किया जा रहा है, जो बुधवार को डॉ. वाईएस परमार बागवानी और वानिकी विश्वविद्यालय, नौनी में शुरू हुई।
विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग द्वारा जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए), सोलन के सहयोग से आयोजित इस कार्यशाला का उद्देश्य संस्थागत तैयारियों को मजबूत करना और अंतर-क्षेत्रीय समन्वय को बढ़ाना है। नीति निर्माता, प्रशासक, विषय विशेषज्ञ, स्वास्थ्य पेशेवर, शिक्षाविद और विभिन्न विभागों के प्रतिनिधि जलवायु परिवर्तन से संबंधित आपदाओं और उनसे जुड़े जोखिमों पर विचार-विमर्श करने के लिए एकत्रित हुए हैं।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए, सोलन के अतिरिक्त उपायुक्त-सह-सीईओ, डीडीएमए सोलन, राहुल जैन ने कहा कि सोलन जिले ने हाल के वर्षों में कई प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया है और यहाँ एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र भी स्थित है, जिससे यह जिला कई जोखिमों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि कार्यशाला के परिणामस्वरूप एक श्वेत पत्र तैयार होगा जो एक प्रभावी और सुव्यवस्थित प्रतिक्रिया तंत्र विकसित करने में सहायक होगा।
जैन ने यह स्वीकार करते हुए कि आपदा से निपटने की तैयारियों में पिछले कुछ वर्षों में सुधार हुआ है, उभरती चुनौतियों से निपटने के लिए अभी बहुत कुछ करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने व्यवहार में बदलाव पर जोर देते हुए समाज में जागरूकता बढ़ाने का आह्वान किया और विशेषज्ञों से व्यावहारिक और लागू करने योग्य समाधान सुझाने का आग्रह किया।
अनुसंधान निदेशक डॉ. देविना वैद्य ने नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों की वहन क्षमता के आकलन के महत्व पर प्रकाश डाला और विकास एवं आपदा जोखिम प्रबंधन के लिए संतुलित एवं टिकाऊ दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सोलन जैसे पहाड़ी जिले जलवायु संबंधी खतरों जैसे अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन, अचानक बाढ़, वन अग्नि और सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों के प्रति तेजी से संवेदनशील होते जा रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में, कार्यशाला का उद्देश्य वैज्ञानिक ज्ञान, नीतिगत ढाँचे और आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों को जिला एवं स्थानीय स्तर पर क्रियाशील योजनाओं में परिवर्तित करना है।
कार्यशाला के मुख्य बिंदुओं पर विस्तार से बताते हुए पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख डॉ. एस.के. भारद्वाज ने कहा कि इसका आयोजन ऐसे नाजुक समय में किया जा रहा है जब राज्य में कई आपदाएं आई हैं, जिनमें जान-माल का भारी नुकसान हुआ है। उन्होंने आगे कहा कि विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के बीच होने वाली चर्चाओं का मुख्य उद्देश्य भविष्य में आने वाली आपदाओं से निपटने के लिए शमन और तैयारी उपायों को मजबूत करना होगा।

