January 12, 2026
National

नए प्रयोगों के साथ राग को कालजयी बनाने वाले ‘गंधर्व कुमार’, बीमारी को मात देकर मंच पर की वापसी

‘Gandharva Kumar’, who made the raga timeless with his new experiments, returns to the stage after overcoming illness.

भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत में ‘पंडित गंधर्व कुमार’ का नाम अमर है। उन्होंने हर राग के साथ नए-नए प्रयोग किए, जिससे हर बार सुनने वाले को ताजा और अनोखा एहसास हुआ। चाहे शास्त्रीय संगीत की गहरी समझ हो या बिल्कुल न हो, उनकी आवाज सुनते ही लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

महानायक पंडित कुमार गंधर्व की पुण्यतिथि 12 जनवरी को है। उनकी गायकी आज भी हर सुनने वाले को मंत्रमुग्ध कर देती है। पंडित कुमार गंधर्व का जन्म 8 अप्रैल 1924 को कर्नाटक के बेलगाम जिले के सुलेभावी गांव में हुआ था। उनका असली नाम शिवपुत्र सिद्धारमैया कोमकली था। वह चार भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर थे।

गंधर्व कुमार के घर में संगीत का माहौल था। उनके पिता सिद्धारमैया को गाने का शौक था, जिसका सीधा असर उन पर भी पड़ा और सात साल की छोटी उम्र में ही नन्हें शिवपुत्र ने इतना शानदार गाना शुरू कर दिया कि सब हैरान रह गए। बच्चे की असाधारण प्रतिभा देखकर पिता उन्हें अपने गुरु स्वामी वल्लभदास के पास ले गए। स्वामीजी ने पहली बार उनकी आवाज सुनी और कहा, “यह तो सचमुच गंधर्व है!” बस उसी दिन से उन्हें ‘कुमार गंधर्व’ की उपाधि मिल गई और यही नाम पूरे देश-दुनिया में मशहूर हो गया।

कुमार गंधर्व ने भारतीय शास्त्रीय संगीत में क्रांति ला दी। उन्होंने कई नए रागों की रचना की, जिन्हें ‘धुनुगम राग’ कहा जाता है। उनका मानना था कि राग सिर्फ स्वरों का समूह नहीं होता, बल्कि उसकी एक अपनी गति, भाव और जीवन होता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि असली राग लोक संगीत की धुनों से ही जन्म लेते हैं। उन्होंने उन लोक धुनों का गहरा अध्ययन किया, जिनमें से पहले राग नहीं बने थे। ऐसे सुरों से उन्होंने नए राग बनाए और शास्त्रीय संगीत को नई समृद्धि दी।

उनकी गायकी में जयपुर घराने की सटीकता, आगरा घराने की वाकपटुता और ग्वालियर घराने की गहराई तीनों का अनोखा मेल था। लेकिन, वह कभी किसी एक फॉर्मूले में नहीं बंधे। हर बार कुछ नया प्रयोग करते थे। चाहे ऋतुसंगीत हो या बालगंधर्व जैसे विशेष कार्यक्रम, उनकी प्रस्तुति हमेशा अलग और अनोखी रहती थी।

उनके जीवन में गिरता स्वास्थ्य एक बड़ा संकट बनकर आया। दिक्कत हुई तो डॉक्टर के पास गए और पता चला कि टीबी की वजह से एक फेफड़े को गंभीर क्षति पहुंची है और वह सही हालत में नहीं है। यहां तक कि डॉक्टरों ने कह दिया कि अब सामान्य तरीके से गाना मुश्किल होगा। लेकिन कुमार गंधर्व ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी गायकी में बदलाव किया, सांस लेने की तकनीक बदली और रागों के साथ नए-नए प्रयोग शुरू किए। उन्होंने पहले से मौजूद रागों को भी मिलाकर नई धुनें निकालीं। इस बदलाव ने उनकी कला को और भी गहरा और अनूठा बना दिया और इसी बदलाव के साथ उन्होंने मंच पर वापसी की।

कुमार गंधर्व का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने संगीत को सिर्फ नियमों का पालन नहीं, बल्कि भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा माध्यम बनाया। उनके योगदान को सम्मान देते हुए भारत सरकार ने साल 1977 में पद्म भूषण और साल 1990 में पद्म विभूषण से नवाजा। कुमार गंधर्व पर लिखी किताब ‘कालजयी’ में लेखिका रेखा इनामदार साने कई किस्सों और गायकी को खूबसूरती से पेश करती हैं।

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