सिरसा में हाल ही में हुए नगर निगम चुनाव में भाजपा और हरियाणा लोकहित पार्टी (एचएलपी) गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल की है। गठबंधन ने 32 में से 20 वार्ड जीते और चेयरमैन पद पर कब्जा किया। हालांकि सभी उम्मीदवार भाजपा के चुनाव चिह्न पर लड़े, लेकिन विजयी पार्षदों में से कई पूर्व मंत्री और एचएलपी सुप्रीमो गोपाल कांडा के समर्थक हैं। ऐसे में उम्मीद है कि कांडा बंधु अपने किसी समर्थक को वाइस चेयरमैन पद पर बिठाने की कोशिश करेंगे।
यह जीत भाजपा के लिए लगातार दूसरी बार चेयरमैन पद पर जीत का प्रतीक है। पिछली बार 2016 में भाजपा के पास चेयरमैन पद था, जब शीला सहगल ने इस पद पर जीत हासिल की थी। इस बार कांडा बंधुओं ने भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभाई। हालांकि, गोबिंद कांडा ने कहा कि उपाध्यक्ष पद के लिए नाम पार्टी की प्रणाली के अनुसार ऊपर से तय किया जाएगा।
20 विजयी भाजपा पार्षदों में वार्ड 4 से सनप्रीत सोढ़ी, वार्ड 5 से जसपाल सिंह, वार्ड 7 से सुमन शर्मा और कई अन्य शामिल हैं। इनमें से 10 से ज़्यादा पार्षद गोपाल कांडा के समर्थक माने जाते हैं, जिससे आने वाले फ़ैसलों में उनके प्रभाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
सिरसा में अग्रवाल, पंजाबी, सैनी और एससी वर्ग जैसे समुदायों का एक बड़ा वोट आधार है। भाजपा इन समूहों के साथ अपने संबंध को और मजबूत करने के लिए उपाध्यक्ष पद का उपयोग कर सकती है। चूंकि शहर का वर्तमान विधायक पंजाबी समुदाय से है और नया चेयरमैन एससी समुदाय से है, इसलिए अग्रवाल समुदाय से किसी को उपाध्यक्ष पद पर नियुक्त करने से भाजपा को अपने मतदाता आधार को संतुलित करने में मदद मिल सकती है।
वैसे तो चुनाव भाजपा के चुनाव चिह्न पर लड़ा गया था, लेकिन इसकी रणनीति गोपाल कांडा और उनके भाई गोविंद ने ही बनाई थी। जीत के बाद चेयरमैन पद के उम्मीदवार शांति स्वरूप वाल्मीकि भाजपा कार्यालय जाने से पहले कांडा बंधुओं के साथ तारा बाबा की कुटिया गए। इससे पता चलता है कि चुनाव के नतीजों में कांडा बंधुओं का कितना प्रभाव रहा।
कांग्रेस को बड़ा झटका सिरसा नगर निगम चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस पार्टी को बड़ा झटका दिया है। शहर से सांसद और विधायक होने के बावजूद कांग्रेस न केवल चेयरमैन पद हार गई बल्कि 32 में से 22 वार्डों में भाजपा से पीछे रह गई।
इससे भी ज़्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि एक-चौथाई वार्ड यानी 32 में से 8 वार्ड में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार तीसरे नंबर पर रहे। इन इलाकों में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों से ज़्यादा वोट निर्दलीय उम्मीदवारों को मिले। यह इसलिए भी चौंकाने वाली बात है क्योंकि सिर्फ़ पांच महीने पहले ही कांग्रेस ने शहर में विधानसभा चुनाव जीता था।
नगर निगम चुनाव में कांग्रेस ने पार्टी के चुनाव चिह्न पर सिर्फ अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा, जबकि कांग्रेस विधायक गोकुल सेतिया ने वार्ड पार्षद पद के लिए खुद ही उम्मीदवार चुने। गोकुल सेतिया ने अपने पसंदीदा उम्मीदवारों की सूची भी जारी की। उनके प्रयासों के बावजूद उनके समर्थित उम्मीदवारों में से सिर्फ 10 ही पार्षद की सीट जीत पाए।