7 अप्रैल । भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में तेजी से उभरकर देश की अर्थव्यवस्था का एक मजबूत स्तंभ बन गया है। केंद्रीय बजट 2026-27 में इस सेक्टर के लिए 2,761.80 करोड़ रुपए की अब तक की सबसे बड़ी वार्षिक बजटीय सहायता प्रस्तावित की गई है, जो इसकी बढ़ती अहमियत को दर्शाती है। इसमें से 2,500 करोड़ रुपए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के तहत आवंटित किए गए हैं, जो इस क्षेत्र के विकास का मुख्य आधार बनी हुई है।
एक आधिकारिक बयान में सरकार ने बताया कि भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश बन चुका है और वैश्विक उत्पादन में उसका लगभग 8 प्रतिशत योगदान है। वित्त वर्ष 2013-14 में जहां मछली उत्पादन 95.79 लाख टन था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 197.75 लाख टन तक पहुंच गया है। यानी इस अवधि में 106 प्रतिशत की जबरदस्त वृद्धि दर्ज की गई है।
साथ ही, बयान में कहा गया है कि समुद्री खाद्य निर्यात भी तेजी से बढ़ा है और वित्त वर्ष 2024-25 में यह 62,408 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। जमे हुए झींगे (फ्रोजन श्रिम्प) भारत के प्रमुख निर्यात उत्पाद बने हुए हैं, जबकि अमेरिका और चीन इसके बड़े बाजार हैं।
सरकार के मुताबिक, मत्स्य पालन क्षेत्र खासकर तटीय और ग्रामीण इलाकों में रोजगार, आय और खाद्य सुरक्षा का महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका है। कृषि सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) में इसकी हिस्सेदारी करीब 7.43 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में सबसे ज्यादा है।
सरकारी योजनाओं के जरिए अब तक 4.39 लाख मछुआरों को किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) का लाभ मिला है, 33 लाख से अधिक लोगों को बीमा कवरेज मिला है और करीब 7.44 लाख मछुआरा परिवारों को आजीविका सहायता दी गई है। इतना ही नहीं, वर्ष 2014-15 के बाद से इस क्षेत्र में लगभग 74.66 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं।
सरकार द्वारा 2015 में शुरू की गई ‘नीली क्रांति’ ने इस क्षेत्र को नई दिशा दी। इसके बाद 2020 में शुरू की गई प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) ने उत्पादन, बुनियादी ढांचे और मूल्य शृंखला विकास को नई गति दी।
इस योजना के तहत अब तक हजारों तालाब, जलाशय पिंजरे, परिवहन इकाइयां और कोल्ड स्टोरेज जैसी सुविधाएं विकसित की गई हैं। 5 मार्च 2026 तक पीएमएमएसवाई के तहत, 23,285 हेक्टेयर तालाब क्षेत्र, 52,058 जलाशय पिंजरे और 27,189 मछली परिवहन इकाइयों को मंजूरी दी जा चुकी है।
साथ ही, 902.97 करोड़ रुपए के निवेश से 12,081 आरएएस इकाइयों और 523.30 करोड़ रुपए के निवेश से 4,205 बायो-फ्लॉक इकाइयों को मंजूरी दी गई है, जो इस क्षेत्र में तकनीकी बदलाव का संकेत है।
इतना ही नहीं, मत्स्य पालन में अब आधुनिक तकनीकों का तेजी से इस्तेमाल हो रहा है। सरकार मत्स्य पालन क्षेत्र में बंदरगाह, लैंडिंग सेंटर, कोल्ड चेन, प्रोसेसिंग यूनिट और मार्केटिंग नेटवर्क को मजबूत करने पर भी जोर दे रही है। इससे न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि किसानों को बेहतर दाम भी मिलेंगे और निर्यात प्रतिस्पर्धा भी मजबूत होगी।

