March 9, 2026
Entertainment

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: भंसाली की फिल्मों के वो महिला किरदार जिन्होंने पर्दे पर गढ़े नए आयाम, हर सीन में दिखा वीमेन टच

International Women’s Day: The female characters in Bhansali’s films who created new dimensions on screen, a feminine touch visible in every scene

8 मार्च । आज विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है, जहां एक दिन नारी को सम्मान देने के लिए चुना गया है। हिंदी सिनेमा में महिलाओं को अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी है।

पहले महिलाओं को साइड कैरेक्टर और ग्लैमर की तरह फिल्मों में लिया जाता था, लेकिन कुछ अभिनेत्रियों और फिल्म निर्माताओं-निर्देशकों की वजह से महिलाओं की स्थिति में बदलाव आना शुरू हुआ। ऐसे ही एक निर्माता-निर्देशक हैं संजय लीला भंसाली, जिनकी हर फिल्म फीमेल ओरिएंटेड रही है।

भंसाली ऐसे निर्देशक हैं, जिनकी फिल्मों में फीमेल लीड, चाहे वह सकारात्मक किरदार में हो या फिर नकारात्मक किरदार में, उन्हें अलग ग्रेस के साथ पर्दे पर उतारा जाता है। उनके किरदार बेहतरीन होते ही हैं, लेकिन उसके साथ उनके कपड़ों से लेकर डायलॉग तक पर खूब मेहनत की जाती है। यही वजह है कि उनकी फिल्म का हर किरदार जीवांत लगता है। संजय लीला भंसाली की हर फिल्म में फीमेल टच मिल जाता है क्योंकि उन्हें असल जिंदगी में भी सिर्फ उनकी मां ने पाला है। उन्होंने अपनी मां के हर काम को बहुत करीब से देखा है, और यही वजह है कि जो काम उनकी मां को करने पड़े, वो नहीं चाहते हैं कि उनकी फिल्मों के महिला किरदारों में वो छवि देखने को मिले। उन्होंने अपनी मां को पैसे के लिए छोटे मंचों पर डांस करते हुए देखा। यही कारण है कि उनकी फिल्मों में महिला किरदारों के लिए बड़े और लग्जरी भव्य सेट बनवाए जाते हैं। उन्होंने कई ऐसी फिल्मों का निर्देशन किया, जिसमें महिला किरदारों के उस रुपहले रूप को दिखाया, जिसके किसी दूसरे निर्देशक ने छुआ तक नहीं।

पहले नंबर पर आती है फिल्म ‘खामोशी-द म्यूजिकल’। फिल्म में मनीषा कोइराला का एनी वाला किरदार भी ऐसी महिला की कहानी है, जो अपने सपनों को पीछे छोड़ सिर्फ अपने विकलांग माता-पिता की सेवा में जुटी है। अपने प्यार समीर से मुलाकात के बावजूद भी वो प्यार और परिवार में से परिवार को चुनती है, लेकिन माता-पिता द्वारा घर से बाहर निकालने के बाद भी वो एक मजबूत महिला की तरह अपना जीवन बिताती है।

‘हम दिल दे चुके सनम’ में ऐश्वर्या राय की सुंदरता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के बजाय, उन्हें ऐसे जीवंत इंसान के रूप में दिखाया गया है, जिसका व्यक्तित्व उन गहरी नीली आँखों से कहीं परे है। नंदिनी में हमें एक बहुआयामी महिला किरदार देखने को मिलता है, जो स्वतंत्र है और अपने सपनों की उड़ान को जीना चाहती है। नंदिनी चुलबुली है और अपने प्यार के लिए अपने परिवार से लड़ने की ताकत रखती है, वो भी किसी दूसरे पुरुष से शादी के बाद।

फिल्म ‘ब्लैक’ भी फीमेल ओरिएंटेड फिल्म है, जिसमें एक नेत्रहीन और बधिर महिला के नजरिए से संसार को दिखाने की कोशिश की गई है। फिल्म में रानी का किरदार ऐसे लड़की है जो न तो सुन पाती है और न ही देख पाती है। यह किरदार रानी के लिए निभाना बहुत मुश्किल रहा हैं।

फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ में न सिर्फ मस्तानी, बल्कि काशीबाई के किरदार को भी खूब सराहा गया। मस्तानी जहां प्यार पाने के लिए जंग से भी पीछे नहीं हटती, वहीं काशीबाई अपने परिवार और राज्य के लिए हर परिस्थिति का सामना अकेले करती हैं। फिल्म में दोनों ही किरदार अकेले हैं, लेकिन सशक्त हैं। मस्तानी और काशीबाई दोनों ही तलवार उठाकर अपने लिए लड़ना जानती हैं।

भंसाली की ‘पद्मावती’ में दीपिका के ग्रेसफुल महारानी के किरदार को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। फिल्म राजपूती शान और शौर्य पर बनी है, जहां फिल्म में शाहिद कपूर के होने के बावजूद भी मुख्य भूमिका दीपिका पादुकोण की थी। फिल्म में गहनों से सजी महारानी अपने नारीत्व को बचाने के लिए खिलजी जैसे आक्रमणकारी से रणनीतिक तरीके से लड़ जाती है और आखिर में महिलाओं के सम्मान बचाने की लड़ाई में जौहर करती है।

आलिया भट्ट का गंगूबाई का किरदार भी शानदार था। फिल्म में किरदार को ऐसे गढ़ा गया, जिसमें नारी को शक्ति और संहार दोनों का प्रतीक दिखाया गया। फिल्म में नारी को कोमल नहीं कठोर दिखाया गया, जिसने हर दलदल में कमल की तरह खिलना चुना। इसके अलावा, हीरामंडी में हर किरदार अपने आप में संपूर्ण था। फिल्म वैश्याओं की कहानी पर बनी है, जो सत्ता और सर्वोपरी होने की जंग में हर पैतरा आजमाती है। फिल्म के हर सीन में हर किरदार को बोल्डनेस के साथ पेश किया गया।

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