June 23, 2026
National

जम्मू-कश्मीरः मक्का-धान छोड़ लैवेंडर की खेती से बदल रही किसानों की तकदीर

Jammu and Kashmir: Farmers’ fortunes are changing from maize and paddy to lavender cultivation.

जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले का भदेरवाह क्षेत्र “भारत की लैवेंडर राजधानी” के नाम से प्रसिद्ध है। यह इलाका अपने खूबसूरत बैंगनी लैवेंडर के खेतों और सफल लैवेंडर खेती के लिए जाना जाता है। यहां हजारों किसानों ने मक्का और धान जैसी पारंपरिक फसलों की जगह लैवेंडर की खेती को अपनाया है, क्योंकि इससे बेहतर आय होती है और पानी की भी कम आवश्यकता पड़ती है।

भदेरवाह के किसानों ने लेलरोट और टिपरी क्षेत्रों में लैवेंडर की कटाई शुरू कर दी है। खिले हुए खेत चमकीले बैंगनी रंग और मनमोहक सुगंध से वातावरण को महका रहे हैं। कटाई शुरू होने के साथ ही यह क्षेत्र एक बार फिर लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है, जो लैवेंडर उत्पादन में इसकी बढ़ती सफलता को दर्शाता है। किसान सावधानीपूर्वक फूलों की कटाई कर रहे हैं, जिनका उपयोग आवश्यक तेल, इत्र, सौंदर्य प्रसाधन और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।

पिछले कुछ वर्षों में लैवेंडर की खेती स्थानीय किसानों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत बनकर उभरी है और इसने क्षेत्र के कृषि तथा आर्थिक विकास में अहम योगदान दिया है।

भदेरवाह में लैवेंडर की खेती की शुरुआत लगभग वर्ष 2010 में हुई थी, जब सीएसआईआर-भारतीय एकीकृत चिकित्सा संस्थान (सीएसआईआर-आईआईआईएम) ने कुछ किसानों को लैवेंडर के पौधे उपलब्ध कराए। बाद में सरकार समर्थित अरोमा मिशन के तहत किसानों को प्रशिक्षण, रोपण सामग्री और लैवेंडर तेल निकालने के लिए आसवन इकाइयां उपलब्ध कराई गईं। आज भदेरवाह और आसपास के क्षेत्रों में 2,500 से अधिक किसान परिवार लैवेंडर की खेती से जुड़े हुए हैं।

लैवेंडर किसान रोशन ने आईएएनएस से कहा, “लेलरोट और टिपरी से लैवेंडर की खेती की शुरुआत हुई थी। यहां के किसानों की मेहनत की वजह से लैवेंडर को ‘एक जिला-एक उत्पाद’ योजना में शामिल किया गया। मैंने वर्ष 2015 में एक कनाल (5,445 वर्ग फुट) भूमि पर लैवेंडर की खेती शुरू की थी। आज मैं 20 कनाल भूमि पर इसकी खेती कर रहा हूं।”

उन्होंने कहा, “पहले हम पारंपरिक खेती करते थे, लेकिन उससे परिवार का गुजारा मुश्किल से हो पाता था। अब लैवेंडर की खेती से आय बढ़ी है और हम अन्य लोगों को भी रोजगार दे रहे हैं। मेरे साथ आज 200 किसान जुड़े हुए हैं। जो जमीनें बंजर हो चुकी थीं, उन पर भी लैवेंडर की खेती की जा रही है। जो किसान स्वयं खेती नहीं करना चाहते, उनसे जमीन किराये पर लेकर लैवेंडर उगाया जा रहा है। इस खेती के लिए फ्लोरीकल्चर विभाग पूरा सहयोग दे रहा है।”

एक अन्य किसान कुलदीप कुमार ने कहा, “पहले हम मक्का, दाल और अन्य पारंपरिक फसलें उगाते थे, लेकिन उनसे ज्यादा लाभ नहीं होता था, क्योंकि बंदर फसलों को नुकसान पहुंचा देते थे। पिछले 10-12 वर्षों से लैवेंडर की खेती कर रहे हैं और इससे काफी फायदा हो रहा है। यह फसल साल में दो बार कटाई के लिए तैयार हो जाती है। लैवेंडर का अच्छा दाम मिलता है, जिससे हमारी आर्थिक स्थिति में काफी सुधार आया है।”

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