6 फरवरी । केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ बनकर उभर रही है। इसका प्रमाण तिरुवनंतपुरम नगर निगम में भाजपा की ऐतिहासिक जीत से मिला है।
इस जीत के साथ भाजपा ने सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे से नगर निगम का नियंत्रण छीन लिया। वाम मोर्चा पिछले 40 साल से भी ज्यादा समय से इस सिविक बॉडी पर काबिज था।
भाजपा के रणनीतिकार अब इस जिले को आने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी का केंद्र मान रहे हैं। 101 सदस्यों वाले नगर निगम में भाजपा ने 50 सीटें जीतीं। वाम मोर्चे को 29 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ को 20 सीटों पर जीत मिली। इसके अलावा, दो निर्दलीय उम्मीदवार भी चुने गए, जिनमें से एक ने बाद में भाजपा को समर्थन दे दिया। इससे भाजपा का आंकड़ा 51 तक पहुंच गया और पार्टी ने नगर निगम में बहुमत हासिल कर लिया।
भाजपा के लिए यह जीत सिर्फ एक नगर निगम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सालों की जमीनी संगठनात्मक मेहनत का नतीजा है। इससे यह भी साबित होता है कि केरल की राजनीति में भाजपा अब मजबूती से मुकाबला कर सकती है।
इस जिले में कुल 14 विधानसभा क्षेत्र हैं। भाजपा लगातार अपना अंतर कम कर रही है। 2011 में पार्टी सिर्फ एक विधानसभा सीट पर दूसरे स्थान पर रही थी। 2016 में यह संख्या बढ़कर दो सीटों तक पहुंच गई और 2021 में भाजपा चार सीटों पर दूसरे नंबर पर रही।
दूसरी ओर, कांग्रेस की स्थिति लगातार कमजोर हुई है। 2011 में कांग्रेस ने आठ सीटें जीती थीं। लेकिन, 2016 में यह घटकर चार रह गईं और 2021 में पार्टी को सिर्फ एक सीट ही मिल पाई।
यह रुझान दिखाता है कि अगर दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय चुनावों जैसा ही मतदान पैटर्न विधानसभा चुनाव में दोहराया गया, तो भाजपा तिरुवनंतपुरम जिले में अपने बढ़ते प्रभाव को कई सीटों पर जीत में बदल सकती है, खासकर कांग्रेस के कब्जे वाली सीटों पर।
राज्य भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने घोषणा की है कि वे नेमोम विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे। यह वही सीट है, जिसे भाजपा ने 2016 में जीता था। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता शशि थरूर को चुनौती दी थी।
भाजपा की अन्य लक्षित सीटों में कझाकूटम, वट्टियूरकावु और अटिंगल शामिल हैं, जहां पार्टी 2021 के विधानसभा चुनाव में दूसरे स्थान पर रही थी। तिरुवनंतपुरम नगर निगम में जीत से भाजपा को नई ऊर्जा और आत्मविश्वास मिला है। अब पार्टी नेता सिर्फ विधानसभा में प्रवेश की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि केरल की राजधानी जिले में लेफ्ट और कांग्रेस के लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक दबदबे को खत्म करने की बात कर रहे हैं। इसे राज्य की राजनीति में संभावित बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।


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