N1Live Entertainment ग्रामोफोन से सीखा संगीत, सुलोचना चव्हाण बनीं लावणी की मिसाल
Entertainment

ग्रामोफोन से सीखा संगीत, सुलोचना चव्हाण बनीं लावणी की मिसाल

Learning music from the gramophone, Sulochana Chavan became the epitome of Lavani.

17 मार्च । मराठी संगीत और लावणी की दुनिया में सुलोचना चव्हाण का नाम हमेशा याद किया जाएगा। उनकी गायकी में जो भाव और ताकत थी, वह उनकी मेहनत का नतीजा था। इसके लिए उन्होंने कोई प्रशिक्षण नहीं लिया, बल्कि ग्रामोफोन रिकॉर्ड सुनकर अभ्यास किया, वो भी बिना किसी शास्त्रीय शिक्षा के। यह उनकी लगन और प्रतिभा का सबूत है।

सुलोचना चव्हाण का जन्म 13 मार्च 1933 को मुंबई के फणसवाडी इलाके में हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि गायन के प्रति ज्यादा थी। उन्होंने कभी शास्त्रीय संगीत की पढ़ाई नहीं की थी। वह गायन का अभ्यास ग्रामोफोन रिकॉर्ड सुन-सुन कर किया करती थीं। वह घंटों रिकॉर्ड सुनतीं और स्वर एवं ताल को बारीकी से समझतीं। इस मेहनत और लगन ने उन्हें अद्भुत गायिका बना दिया।

उनका पहला गाना सिर्फ नौ साल की उम्र में रिकॉर्ड किया गया। यह गाना हिंदी फिल्म ‘कृष्ण सुदामा’ के लिए था। संगीत निर्देशक श्याम बाबू पाठक की मदद से उन्होंने यह पहला गाना रिकॉर्ड किया। इसके बाद उनका करियर लगातार बढ़ता गया।

सुलोचना चव्हाण ने पार्श्वगायन के रूप में कई दिग्गज गायक जैसे कि मोहम्मद रफी, मन्ना डे, शमशाद बेगम और गीता दत्त के साथ काम किया। महज 16 साल की उम्र में उन्होंने मन्ना डे के साथ भोजपुरी रामायण में गीत गाए। उनके गायन की ताकत और समझ देखकर बेगम अख्तर भी प्रभावित हुईं। सुलोचना ने मराठी के अलावा हिंदी, गुजराती, भोजपुरी, तमिल और पंजाबी भाषाओं में भी गाने गाए।

लावणी की दुनिया में उनका पहला बड़ा मुकाम ‘हीच माझी लक्ष्मी’ फिल्म की लावणी से आया। इस गाने ने उनके करियर को लावणी की ओर मोड़ दिया। उन्होंने आचार्य अत्रे द्वारा दी गई ‘लावणीसम्राज्ञी’ की उपाधि को गर्व से अपनाया। उनका मानना था कि लावणी की शुरुआत ही मजबूत और जोरदार होनी चाहिए। यह नजरिया उनके हर गाने में साफ दिखाई देता था।

सुलोचना चव्हाण ने अपने करियर में कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त किए। उन्हें 2010 में लता मंगेशकर पुरस्कार, 2012 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2022 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इसके अलावा, उन्हें लोकशाहीर पाटील बापूराव पुरस्कार और राम कदम पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिले।

उनका करियर लगभग 60 सालों से अधिक समय तक चला। इस दौरान उन्होंने सोलो गाने, पार्श्वगायन और लाइव परफॉर्मेंस के जरिए दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई।

सुलोचना चव्हाण ने 10 दिसंबर 2022 को 92 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली।

Exit mobile version