February 21, 2026
Entertainment

ओम प्रकाश: जब फिल्म निर्माण के जादू को देख चौंक गए लोग, कहानी को दिया खूब प्यार

Om Prakash: When people were stunned by the magic of filmmaking, they loved the story.

21 फरवरी । हिंदी सिनेमा की दुनिया में कुछ ऐसे कलाकार हुए हैं, जिन्होंने केवल अभिनय से ही नहीं, बल्कि फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी अपनी छाप छोड़ी। ऐसे ही एक नाम हैं ओम प्रकाश, जिनका सफर हमेशा दिलचस्प और प्रेरणादायक रहा। आज हम ओम प्रकाश की पुण्यतिथि पर उनके कला के बारे में बात करेंगे। उन्होंने अपने अभिनय के जादू से दर्शकों के बीच अपनी जगह बनाई और फिल्म निर्माण में भी अपनी प्रतिभा दिखाते हुए सभी को हैरान कर दिया। उन्होंने कई यादगार फिल्मों को प्रोड्यूस भी किया।

ओम प्रकाश ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत थिएटर से की और धीरे-धीरे मंच पर अपनी छवि बनाई। उनके अभिनय में एक अलग ही आत्मविश्वास होता था, और यही आत्मविश्वास उन्हें फिल्मों तक लेकर आया। उन्होंने हिंदी सिनेमा में 300 से ज्यादा फिल्मों में किरदार निभाए। वह सिर्फ एक्टिंग से संतुष्ट नहीं थे, बल्कि उनके अंदर फिल्म निर्माण करने की भी चाहत थी, जिसे वह अनोखे अंदाज में पर्दे पर लेकर आए।

ओम प्रकाश ने ‘गेटवे ऑफ इंडिया’, ‘चाचा जिंदाबाद’ और ‘संजोग’ जैसी प्रमुख फिल्मों का निर्माण किया। इन फिल्मों में उनका योगदान केवल निर्माता तक सीमित नहीं था। ओम प्रकाश ने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि फिल्मों में किरदारों की गहराई और कहानी की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाए।

‘गेटवे ऑफ इंडिया’ में उन्होंने समाज और परिवार के रिश्तों की बारीकियों को दिखाया। यह फिल्म 1957 में रिलीज हुई। यह एक सस्पेंस से भरी फिल्म है, जो मुख्य रूप से एक ही रात में मुंबई की सड़कों पर घटित होती है। कहानी अंजू (मधुबाला) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने हत्यारे चाचा से बचकर भाग रही है और शहर के आपराधिक तत्वों से टकराती है। वह दोषियों को सुबह 6:30 बजे गेटवे ऑफ इंडिया पर पकड़वाने के लिए एक साजिश रचती है। इस फिल्म में ओम प्रकाश ने शंकर का किरदार निभाया था।

वहीं, ‘चाचा जिंदाबाद’ फिल्म में उनका नजरिया थोड़ा अलग था। इस फिल्म में उन्होंने अभिनय के साथ-साथ इसकी कहानी भी लिखी थी। 1959 में रिलीज हुई यह क्लासिक कॉमेडी ड्रामा फिल्म है। इसमें किशोर कुमार और अनीता गुहा मुख्य भूमिकाओं में नजर आए। इसकी कहानी दो बचपन के दोस्तों की है, जिसमें एक कर्नल और एक जज होते हैं। वे अपने बच्चों की शादी कराकर दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलना चाहते हैं, लेकिन उनके बच्चे शादी से बचने के लिए दोनों पिताओं के बीच दुश्मनी कराने की योजना बनाते हैं।

‘संजोग’ की बात करें तो इसमें ओम प्रकाश ने पारिवारिक और व्यक्तिगत रिश्तों की जटिलताओं को बड़े ही सहज अंदाज में पर्दे पर उतारा। फिल्म की कहानी लाली और श्यामू के इर्द-गिर्द घूमती है। लाली और श्यामू की शादी होती है, लेकिन श्यामू की गैर-जिम्मेदाराना हरकतों के कारण परिवार में तनाव रहता है। कहानी में एक बच्चे के जन्म के बाद लाली की मानसिक स्थिति बिगड़ने लगती है और एक दिन लोगों को लगता है कि उसकी मौत हो गई है, लेकिन असल में वह जीवित होती है। यहां कहानी में कई मोड़ देखने को मिलते हैं।

ओम प्रकाश ने हमेशा कलाकारों के महत्व को समझा, चाहे वह उनकी खुद की फिल्में हों या किसी अन्य बड़े प्रोजेक्ट में सहयोग। उनका मानना था कि कहानी के हर किरदार को समान महत्व मिलना चाहिए।

अभिनय और निर्माण के इस सफर ने ओम प्रकाश को हिंदी सिनेमा के सबसे भरोसेमंद कलाकारों में से एक बना दिया। उन्होंने 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया और हर फिल्म में अपनी अलग पहचान बनाई। उनके किरदार ‘दद्दू’ और ‘मुंशी लाल’ जैसी भूमिकाओं ने दर्शकों के दिल में स्थायी जगह बना दी।

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