N1Live Punjab पंजाब कैबिनेट की मांग: राज्य के विचार लेने और उन पर गौर करने तक जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति और शपथ ग्रहण समारोह को रोका जाए
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पंजाब कैबिनेट की मांग: राज्य के विचार लेने और उन पर गौर करने तक जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा की नियुक्ति और शपथ ग्रहण समारोह को रोका जाए

Punjab Cabinet's demand: The appointment and swearing-in ceremony of Justice Ashwani Kumar Mishra should be put on hold until the state's views are sought and considered.

अनिल भारद्वाज

चंडीगढ़ 6 सितम्बर | मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के नेतृत्व में पंजाब कैबिनेट ने आज भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की ओर से पंजाब के संवैधानिक अधिकारों और निर्धारित प्रक्रिया को नजरअंदाज करने की एक और घटना की पुरजोर निंदा की। पंजाब सरकार की राय की प्रतीक्षा किए बिना जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त करने पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कैबिनेट ने प्रस्ताव पारित किया कि जब तक पंजाब की राय नहीं ले ली जाती और उन पर योग्य विचार नहीं कर लिया जाता, तब तक नियुक्ति और शपथ ग्रहण की प्रक्रिया को रोका जाए।

एक्स पर पोस्ट करते हुए मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कहा, “आज पंजाब कैबिनेट ने केंद्र सरकार की ओर से पंजाब के अधिकारों पर लगातार किए जा रहे हमलों और संवैधानिक नियमों के उल्लंघन के खिलाफ सर्वसम्मति से महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया है। राज्य सरकार की सहमति लिए बिना पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के नए चीफ जस्टिस की नियुक्ति करना निर्धारित प्रक्रिया (मेमोरंडम ऑफ प्रोसीजर) और संवैधानिक नियमों की सीधा उल्लंघन है। केंद्र की ओर से हमारे 9,000 करोड़ रुपए के आर.डी.एफ. और बाढ़ राहत पैकेज को रोकना, बी.बी.एम.बी. के नियम बदलना और अब न्यायिक नियुक्तियों में सीधा दखल देना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। हमारी मांग है कि इस नियुक्ति को तुरंत रोका जाए और संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार राज्य की राय को उचित सम्मान दिया जाए। इंकलाब जिंदाबाद।”

इस बारे में जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री ऑफिस ने कहा, “केंद्र सरकार लंबे समय से पंजाब के अधिकारों का उल्लंघन कर रही है। हाल के दिनों में केंद्र का दखल बहुत बढ़ गया है, जिसमें पंजाब को भारत के संविधान और कई नियमों/कानूनों के तहत मिले अधिकारों से बार-बार वंचित किया गया है।”

मुख्यमंत्री कार्यालय ने कहा, “केंद्र ने भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बी.बी.एम.बी.) के नियमों में सर्वसम्मति से बदलाव करके उस पारंपरिक परंपरा को खत्म कर दिया, जिसके तहत सदस्य (पावर) का चयन पंजाब से होना सुनिश्चित था। इससे राज्य के अपने नदीय जल और बांधों पर इसकी प्रतिनिधित्व को कमजोर किया गया है। इसके अलावा केंद्र ने पंजाब यूनिवर्सिटी के केंद्रीकरण का प्रस्ताव रखा था, जिसका पंजाब द्वारा पुरजोर विरोध किया गया था, लेकिन केंद्र ने अपनी अथॉरिटी का दुरुपयोग करके पंजाब के लोगों की पकड़ और अधिकारों को दबाने के लिए अपना दखल जारी रखा है।”

पंजाब कैबिनेट ने चेतावनी दी, “भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने पंजाब सरकार के 9,000 करोड़ रुपए से अधिक के आर.डी.एफ. के बकाए भी रोक लिए हैं, जिससे किसानों को तकलीफ पहुंची है, जो इन फंडों के जरिए बनाए जाने वाले ढांचे के असल लाभार्थी हैं। इसी तरह केंद्र ने 2025 में आए विनाशकारी बाढ़ों के बाद प्रधानमंत्री के जरिए 1,600 करोड़ रुपए के राहत पैकेज का ऐलान किया था, लेकिन आज तक इस पैकेज में से एक रुपया भी पंजाब को जारी नहीं किया गया।”

दिनांक 5 सितंबर 2026 के ताजा नोटिफिकेशन का हवाला देते हुए पंजाब कैबिनेट ने कहा, “कानून और न्याय मंत्रालय, भारत सरकार के जरिए भारत के राष्ट्रपति ने जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त करने का आदेश पारित किया है। यह नियुक्ति राज्य सरकार की सहमति लिए बिना की गई है, जिससे सभी संवैधानिक नियमों और तय प्रक्रियाओं को दरकिनार किया गया है।”

कैबिनेट ने कहा, “‘हाईकोर्ट के चीफ जस्टिसों और जजों की नियुक्ति और तबादले के लिए मेमोरंडम ऑफ प्रोसीजर’ का पैरा 6 स्पष्ट रूप से निर्देश देता है कि भारत के चीफ जस्टिस के लिए नाम की सिफारिश प्राप्त होने के बाद केंद्रीय कानून, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्री संबंधित राज्य सरकार के विचार प्राप्त करेंगे। राज्य सरकार के विचार प्राप्त होने के बाद केंद्रीय कानून, न्याय और कंपनी मामलों के मंत्री प्रधानमंत्री को प्रस्ताव सौंपेंगे, जो फिर चयन के संबंध में राष्ट्रपति को सलाह देंगे।”

मुख्यमंत्री कार्यालय ने कहा, “जैसा कि 25 जुलाई, 2026 को प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो, भारत सरकार द्वारा पोस्ट किया गया था कि लोकसभा में एक प्रश्न के जवाब में केंद्रीय कानून, न्याय और कंपनी मामलों के राज्य मंत्री ने सदन को सूचित किया था कि उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच निरंतर, एकजुट और सहयोगी प्रक्रिया है। इसलिए राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर विभिन्न संवैधानिक अथॉरिटीज से परामर्श और मंजूरी की जरूरत होती है।”

इसमें आगे कहा गया, “मौजूदा मामले में सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने दिनांक 06 अगस्त, 2026 के प्रस्ताव के जरिए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के कार्यकारी चीफ जस्टिस, जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की थी। 12 अगस्त, 2026 को पंजाब को ‘हाईकोर्ट के चीफ जस्टिसों और जजों की नियुक्ति और तबादले की प्रक्रिया को दर्शाने वाले मेमोरंडम’ के पैरा 6 के तहत सहमति के लिए कानून और न्याय राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल से पत्र प्राप्त हुआ था।”

कैबिनेट का तर्क था, “प्रोसीजर के मेमोरंडम और स्थापित संवैधानिक नियमों की पूरी तरह अनदेखी करते हुए केंद्र ने राज्य सरकार के जवाब की प्रतीक्षा किए बिना जल्दबाजी में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की नियुक्ति नोटिफाई कर दी।”

इसमें आगे कहा गया, “यहां यह बताना जरूरी है कि चीफ जस्टिस की नियुक्ति के मामले में राज्य और राज्यपाल के लिए अपनी सिफारिश भेजने हेतु कोई स्पष्ट समय सीमा निर्धारित नहीं है।”

कैबिनेट ने कहा, “साल 2024 में जब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के जज, जस्टिस गुरमीत सिंह संधावालिया को सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम द्वारा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में नियुक्त करने की सिफारिश की गई थी तो कानून और न्याय मंत्रालय द्वारा दो महीनों से अधिक समय तक इस प्रस्ताव को नोटिफाई नहीं किया गया था और यह स्पष्ट रूप से मध्य प्रदेश सरकार से सिफारिश प्राप्त न होने के कारण था। बाद में कॉलेजियम और कानून और न्याय मंत्रालय ने उनकी नियुक्ति बदलकर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में कर दी। जिससे भेदभाव की भावना झलकती है कि जब पंजाब राज्य के किसी जज के मामले पर विचार किया जाना होता है तो उसके साथ अलग व्यवहार किया जाता है, जबकि किसी अन्य हाईकोर्ट के जज को पंजाब में नियुक्त करने के मामले में अलग।”

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