N1Live Punjab पंजाब चुनाव 2027: पंजाब कांग्रेस के नए अध्यक्ष को लेकर सस्पेंस बरकरार; हाईकमान जाट सिख-दलित समीकरण में उलझा।
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पंजाब चुनाव 2027: पंजाब कांग्रेस के नए अध्यक्ष को लेकर सस्पेंस बरकरार; हाईकमान जाट सिख-दलित समीकरण में उलझा।

Punjab Elections 2027: Suspense persists over the new Punjab Congress chief; High Command grappling with the Jat Sikh-Dalit equation.

चंडीगढ़: पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 नजदीक आते ही कांग्रेस में संगठनात्मक बदलाव को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। हालांकि पार्टी अभी तक प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर अंतिम फैसला नहीं कर सकी है। सूत्रों के अनुसार, शीर्ष नेतृत्व ने संभावित नामों पर मंथन पूरा कर लिया है और राहुल गांधी की सहमति भी मिल चुकी है, लेकिन आधिकारिक घोषणा अभी टाल दी गई है।

जातीय संतुलन बना सबसे बड़ी चुनौती

पंजाब कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती जट्ट सिख और दलित वोट बैंक के बीच संतुलन बनाए रखने की है। राज्य में अनुसूचित जाति (SC) की आबादी करीब 32 प्रतिशत है, जबकि जट्ट सिख समुदाय संख्या में कम होने के बावजूद राजनीति, कृषि और ग्रामीण समाज में मजबूत प्रभाव रखता है। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष का चयन केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक संदेश देने वाला फैसला भी माना जा रहा है।

क्या चरणजीत सिंह चन्नी बनेंगे प्रदेश अध्यक्ष?

पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का नाम सबसे प्रमुख दावेदारों में माना जा रहा है। यदि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता है तो दलित समुदाय को सकारात्मक संदेश जा सकता है। वहीं, पार्टी के भीतर आशंका है कि इससे जट्ट सिख वोटों का एक वर्ग अन्य दलों की ओर आकर्षित हो सकता है। दूसरी ओर, यदि चन्नी को जिम्मेदारी नहीं मिलती है तो दलित समाज में नाराजगी का संदेश जाने का भी जोखिम है।

2022 का अनुभव हाईकमान के सामने

कांग्रेस नेतृत्व 2022 विधानसभा चुनाव के अनुभव को भी ध्यान में रखकर आगे बढ़ रहा है। चुनाव से ठीक पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया था, लेकिन पार्टी को अपेक्षित राजनीतिक लाभ नहीं मिला। 2017 में 77 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2022 में घटकर केवल 18 सीटों पर सिमट गई, जबकि उसका वोट शेयर भी काफी कम हो गया। चन्नी स्वयं अपनी दोनों विधानसभा सीटों से चुनाव हार गए थे।

बड़े बदलाव से बचने की रणनीति

पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि चुनाव से ठीक पहले संगठन में बड़ा बदलाव जोखिम भरा हो सकता है। चंडीगढ़ से सांसद मनीष तिवारी भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि किसी भी प्रदेश अध्यक्ष को संगठन खड़ा करने और चुनावी तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए।

अब सबकी नजर कांग्रेस हाईकमान के अंतिम फैसले पर है। प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा न केवल पार्टी की आगामी चुनावी रणनीति तय करेगी, बल्कि यह भी संकेत देगी कि कांग्रेस पंजाब में किस सामाजिक और राजनीतिक समीकरण के साथ चुनावी मैदान में उतरने जा रही है।

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