N1Live National रेलवे ने बताया, ट्रेनों में नॉनवेज खाने के लिए हलाल सर्टिफिकेशन की बाध्यता नहीं : प्रियंक कानूनगो
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रेलवे ने बताया, ट्रेनों में नॉनवेज खाने के लिए हलाल सर्टिफिकेशन की बाध्यता नहीं : प्रियंक कानूनगो

Railways says there is no requirement of Halal certification for non-vegetarian food on trains: Priyank Kanoongo

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने बताया कि हमें एक शिकायत मिली थी जिसमें कहा गया था कि भारतीय रेलवे में परोसा या बेचा जाने वाला नॉन-वेज खाना सिर्फ हलाल तरीके से काटे गए जानवरों से बनाया जाता है।

प्रियंक कानूनगो ने कहा कि हमने यह मुद्दा रेलवे के सामने उठाया और उनसे सफाई मांगी। रेलवे ने बताया कि उनके यहां हलाल सर्टिफिकेशन की कोई बाध्यता नहीं है। हम इस बात के लिए उनकी प्रशंसा करते हैं कि उन्होंने समय पर तुरंत संज्ञान लिया और हमें जवाब दिया। यह उनकी जिम्मेदारी को दर्शाता है।

नई दिल्ली में आईएएनएस से बातचीत में उन्होंने बताया कि हमने उन्हें एक नोटिस के माध्यम से पूछा है कि रेलवे में जो ठेकेदार भोजन बेचते हैं या सप्लायर मांस की आपूर्ति करते हैं, वह हलाल पद्धति से है या झटका पद्धति से। यह इसलिए भी जरूरी है क्योंकि दारुल उलूम देवबंद के अनुसार हलाल पद्धति से जानवर का वध सिर्फ मुसलमान ही कर सकते हैं।

सरकारी एजेंसी होने के नाते रेलवे जो खाना बेच रही है, उसमें मांस किस पद्धति से तैयार किया जा रहा है, यह स्पष्ट होना चाहिए। झटका पद्धति से मांस का वध हिंदू तथा अन्य दलित समुदाय करते हैं। सभी वर्गों के लोगों के जीविका के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए सभी प्रकार के मांस की बिक्री होनी चाहिए।

प्रियंक कानूनगो ने आगे कहा कि रेलवे के साथ-साथ एफएसएसएआई को भी नोटिस जारी कर पूछा गया है कि ऐसी संभावनाओं पर विचार किया जाए, जहां भारत में बिकने वाली मांसाहारी सामग्री पर यह स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट किया जाए कि यह सभी धर्मों के लोग खा सकते हैं या नहीं। किसी के लिए प्रतिबंध है तो उसे स्पष्ट रूप से बता दिया जाए।

उन्होंने कहा कि भारत में एक अन्य अल्पसंख्यक समुदाय सिख समुदाय है। सिख धर्म मानने वालों के लिए पवित्र नियम पुस्तिका है, जिसमें आर्टिकल 24 में स्पष्ट लिखा है कि सिखों को इस्लामी हलाल पद्धति से तैयार किया गया मीट नहीं खाना चाहिए। यह उनके लिए प्रतिबंधित है। यदि एक विशेष पद्धति से तैयार मीट सिख समुदाय के लिए प्रतिबंधित है, तो अंजाने में उन्हें वही भोजन देना धार्मिक आस्था के साथ खिलवाड़ है और मानवाधिकार का उल्लंघन है।

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