April 1, 2026
National

राज्यसभाः कांग्रेस सांसद ने उठाया जेएनयू में सामाजिक न्याय का मुद्दा नई दिल्ली

Rajya Sabha: Congress MP raises issue of social justice in JNU, New Delhi

1 अप्रैल । राज्यसभा में बुधवार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय व विश्वविद्यालय में सामाजिक न्याय का विषय उठाया गया। यह विषय कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह सदन के समक्ष रखा। उन्होंने कहा कि यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण सार्वजनिक मुद्दा है।

उन्होंने कहा कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता कमजोर हो रही है। उन्होंने कहा कि यह विषय भेदभाव को लेकर बढ़ती चिंताओं से संबंधित है। दिग्विजय सिंह ने सदन को बताया कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क के टॉप 10 विश्वविद्यालयों में शुमार है। स्वयं राज्यसभा के कई सांसद इसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र हैं। जब इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई थी, तब इसका उद्देश्य राष्ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक मूल्यों और समाज की चुनौतियों के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देना था।

दिग्विजय सिंह ने कहा कि हाल ही में जेएनयू की कुलपति द्वारा दिए गए बयान में, उन्होंने ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के अनुभवों को स्थायी पीड़ित मानसिकता बताया और यह संकेत दिया कि ऐसी वास्तविकताएं बनाई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि यह विश्वविद्यालय के मूल उद्देश्यों के बिल्कुल विपरीत हैं। ऐसे बयान जातिगत भेदभाव, समानता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति संस्थान की संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।

उन्होंने कहा कि जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 3 वर्षों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों की संख्या में लगभग 25 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसी तरह की चिंताएं फैकल्टी भर्ती प्रक्रिया को लेकर भी सामने आई हैं। यहां 326 रिक्त पदों के लिए चयन समितियां गठित की गईं, जिनमें से 40 प्रतिशत से अधिक मामलों में उम्मीदवारों को ‘उपयुक्त नहीं’ घोषित किया गया।

दिग्विजय सिंह ने कहा इनमें से अधिकांश पद आरक्षित श्रेणी के थे और ऐसे मामलों का अनुपात लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने सदन को बताया कि इसके अतिरिक्त, संकाय पदोन्नति में भी देरी देखी गई है। वर्तमान में 89 पदोन्नति मामले लंबित हैं, जिनमें से 62 निर्धारित समय सीमा से अधिक समय से लंबित हैं। ऐसी देरी न केवल शिक्षकों के करियर विकास को प्रभावित करती है बल्कि पीएचडी मार्गदर्शन की क्षमता पर भी नकारात्मक असर डालती है।

इसके साथ ही उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह आरक्षण के नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करे और सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में समावेशिता और सामाजिक न्याय के संवैधानिक संकल्प की रक्षा करे।

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