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रामेश्वर ठाकुर : स्वतंत्रता सेनानी से राज्यपाल तक, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता की बहुमुखी यात्रा और राष्ट्रसेवा बनी मिसाल

Rameshwar Thakur: From freedom fighter to Governor, the veteran Congress leader's multifaceted journey and service to the nation exemplifies

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में से एक रामेश्वर ठाकुर प्रमुख राजनीतिज्ञ, चार्टर्ड अकाउंटेंट और सामाजिक कार्यकर्ता थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर स्वतंत्र भारत में राजनीति, वित्त, ग्रामीण विकास और राज्यपाल पद तक विभिन्न महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं।

रामेश्वर ठाकुर का जन्म 28 जुलाई 1927 को झारखंड के गोड्डा जिले के ठाकुर गंगटी गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। उन्होंने भागलपुर और पटना विश्वविद्यालय से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की, फिर कोलकाता विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी की डिग्री हासिल की। 1953 में वे इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आईसीएआई) के फेलो बने और 1966-67 में इसके अध्यक्ष भी रहे। यह उपलब्धि उस समय दुर्लभ थी, जब ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति इतने उच्च पद तक पहुंचते थे।

1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय भागीदारी के कारण वे संथाल परगना क्षेत्र में भूमिगत रहे और लगभग छह महीने कोलकाता की सेंट्रल जेल (दमदम) में बंदी रहे। स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका ने उन्हें कांग्रेस से गहराई से जोड़ा।

राजनीतिक जीवन की शुरुआत में वे शिक्षा और प्रबंधन के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। 1955-60 तक कलकत्ता के सिटी कॉलेज में लेक्चरर और 1960-73 तक दिल्ली विश्वविद्यालय के मैनेजमेंट डिपार्टमेंट में विजिटिंग प्रोफेसर रहे। वे बैंकिंग, ग्रामीण विकास और स्काउटिंग जैसे क्षेत्रों में भी योगदान देते रहे। वे 1998-2001 और 2004 से आगे भारत स्काउट्स एंड गाइड्स के अध्यक्ष रहे, साथ ही विश्व स्काउट कांग्रेस में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया।

वे 1984 में बिहार से राज्यसभा सदस्य चुने गए और 1990 तक दो कार्यकाल (1984-1990 और 1990-1996) तक संसद में रहे। राज्यसभा में वे विशेषाधिकार एवं लोक लेखा समिति के सदस्य रहे। 1991 में पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार में उन्हें केंद्रीय राज्यमंत्री बनाया गया। उन्होंने वित्त (राजस्व), ग्रामीण विकास और संसदीय कार्य जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाला। उनके कार्यकाल में ग्रामीण विकास योजनाओं और वित्तीय सुधारों पर फोकस रहा।

राज्यपाल के रूप में उनकी सेवा उल्लेखनीय रही। वे 17 नवंबर 2004 में उड़ीसा (अब ओडिशा) के राज्यपाल बने और 29 जनवरी 2006 से 22 अगस्त 2007 तक आंध्र प्रदेश का अतिरिक्त प्रभार संभाला। 21 अगस्त 2007 से 29 जून 2009 तक कर्नाटक के राज्यपाल रहे, जहां उन्होंने प्रशासनिक स्थिरता और विकास पर जोर दिया। 30 जून 2009 से 7 सितंबर 2011 तक मध्य प्रदेश के राज्यपाल के रूप में कार्य किया। कई राज्यों में राज्यपाल रहते हुए उन्होंने सामाजिक सद्भाव, शिक्षा और ग्रामीण कल्याण को बढ़ावा दिया।

वे इंदिरा गांधी अवॉर्ड फॉर नेशनल इंटीग्रेशन और राजीव गांधी सद्भावना अवॉर्ड के संस्थापक सचिव रहे। संजय गांधी मेमोरियल ट्रस्ट और ठाकुर रिसर्च फाउंडेशन जैसे संगठनों से जुड़े रहे। ग्रामीण विकास, खादी-ग्रामोद्योग और स्वास्थ्य (कैंसर, लेप्रोसी, टीबी) के क्षेत्र में उनके प्रयास सराहनीय थे। रामेश्वर ठाकुर ने 15 जनवरी 2015 को 89 वर्ष की आयु में दिल्ली में अंतिम सांस ली। उनकी पत्नी नर्मदा ठाकुर थीं, और उनके चार बच्चे, दो पुत्र (सुशील और अनिल) और दो पुत्रियां (मृदुला और संगीता), हैं।

आज भी रामेश्वर ठाकुर को एक बहुमुखी व्यक्तित्व, स्वतंत्रता सेनानी, पेशेवर अकाउंटेंट, केंद्रीय राज्यमंत्री और राज्यपाल के रूप में याद किया जाता है। उनकी यात्रा ग्रामीण भारत से उच्च राजनीतिक पद तक की प्रेरणादायक मिसाल है, जो मेहनत, समर्पण और राष्ट्रसेवा का प्रतीक बनी हुई है।

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