पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने रियल एस्टेट डेवलपर जरनैल सिंह बाजवा की सामान्य जमानत याचिका खारिज कर दी है। प्रवर्तन निदेशालय के खिलाफ दायर उनकी याचिका को खारिज करते हुए न्यायमूर्ति मनीषा बत्रा ने कहा कि न्यायालय का यह मत है कि वर्तमान चरण में उन्हें जमानत पर रिहा नहीं किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति बत्रा ने कहा, “वर्तमान मामले में, प्रथम दृष्टया, आरोपों से यह मानने के लिए पर्याप्त आधार मिलते हैं कि याचिकाकर्ता ने पीएमएलए के प्रावधानों के तहत अपराध किए हैं। उनके खिलाफ विशिष्ट आरोप हैं।” बाजवा पर आरोप है कि उन्होंने बाजवा डेवलपर्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक के रूप में, समय पर कब्जे और स्पष्ट स्वामित्व का आश्वासन देकर, निर्दोष व्यक्तियों से भूखंड, फ्लैट और व्यावसायिक स्थान आदि की पेशकश करके व्यवस्थित रूप से “बड़ी मात्रा में धन” एकत्र किया।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बत्रा की पीठ को बताया गया कि ऐसे वादे पूरे नहीं किए गए और ग्राहकों/उपभोक्ताओं द्वारा उनके खिलाफ कई एफआईआर दर्ज कराई गई हैं, जिनमें “प्लॉट की कई बार बिक्री, प्लॉट नंबरों में हेराफेरी और आवश्यक वैधानिक अनुमोदन के बिना आवंटन” का आरोप लगाया गया है।
पीठ को यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ ग्राहकों/उपभोक्ताओं द्वारा 41 एफआईआर दर्ज कराई गई हैं, जिनमें आरोप लगाया गया है कि उनके साथ धोखाधड़ी की गई है और उनकी मेहनत की कमाई हड़प ली गई है। यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता ने विभिन्न अवसरों पर दर्ज अपने बयानों में बीडीएल के तहत रियल एस्टेट परियोजनाओं के लिए ग्राहकों/उपभोक्ताओं से रकम वसूलने की बात स्वीकार की है।
न्यायमूर्ति बत्रा ने कहा, “हालांकि, यह आरोप लगाया गया है कि इन निधियों का उपयोग उन अचल संपत्ति परियोजनाओं के निर्माण या विकास के लिए करने के बजाय, जिनके लिए इन्हें एकत्र किया गया था, इन्हें भूमि के टुकड़ों की खरीद, असुरक्षित ऋण देने, विलासितापूर्ण कारों की खरीद, पारिवारिक फर्मों के असुरक्षित ऋणों के पुनर्भुगतान और अन्य अप्रासंगिक उद्देश्यों की ओर मोड़ दिया गया।”
पीठ ने इस दलील पर भी ध्यान दिया कि ‘अपराध की आय का पता लगाने और उसके सृजन, प्रक्षेपण और हेरफेर में शामिल व्यक्तियों की पहचान करने के लिए 31 मार्च, 2022 को एफआईआर के आधार पर एक प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ईसीआईआर) दर्ज की गई थी’।
न्यायमूर्ति बत्रा की पीठ के समक्ष उपस्थित होकर, भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर-जनरल सत्य पाल जैन ने प्रस्तुत किया कि जांच के दौरान एकत्रित सामग्री, जिसमें याचिकाकर्ता और कुछ अन्य लोगों के बयान, बैंक खाते फ्रीज करना, विलासितापूर्ण वाहनों की बरामदगी और याचिकाकर्ता के अपने ही कर्मचारी द्वारा प्रस्तुत किए गए विसंगत आंकड़े शामिल हैं, प्रथम दृष्टया यह दर्शाते हैं कि याचिकाकर्ता ने – बीडीएल के नियंत्रक के रूप में – झूठे आश्वासनों के तहत गृह खरीदारों से लगभग 662.49 करोड़ रुपये का अग्रिम एकत्र किया। इसका एक बड़ा हिस्सा उन परियोजनाओं में उपयोग करने के बजाय, जिनके लिए धन एकत्र किया गया था, संबंधित संस्थाओं, असुरक्षित ऋणों और व्यक्तिगत अधिग्रहणों के माध्यम से विनियोजित और परिवर्तित किया गया था। याचिकाकर्ता के अपने ही सहयोगी द्वारा प्रामाणिक खाता बही डेटा को गलत तरीके से प्रस्तुत करना और छिपाना स्वयं जांच में बाधा डालने और धन के लेन-देन को छिपाने का एक सचेत प्रयास दर्शाता है।
न्यायमूर्ति बत्रा ने जोर देकर कहा कि न्यायालय को इस बात से संतुष्ट होना आवश्यक है कि यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि आरोपी आरोपित अपराध का दोषी नहीं है और जमानत पर रहते हुए उसके द्वारा कोई अपराध करने की संभावना नहीं है।
न्यायमूर्ति बत्रा ने कहा, “इस स्तर पर, रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से ऐसे कोई उचित आधार स्पष्ट नहीं हैं। इसके अलावा, पीएमएलए की धारा 24 में अपराध की आय के संबंध में एक वैधानिक अनुमान शामिल है। ऐसे मामले में जहां किसी व्यक्ति पर पीएमएलए की धारा 3 के तहत मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाया जाता है, न्यायालय को यह मानने का अधिकार है, जब तक कि इसके विपरीत सिद्ध न हो जाए, कि अपराध की ऐसी आय मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल है।”
मामले का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति बत्रा ने कहा कि इस स्तर पर वैधानिक अनुमान का खंडन करने के लिए कुछ भी रिकॉर्ड पर नहीं लाया गया है। “याचिका खारिज की जाती है। हालांकि, यह स्पष्ट किया जाता है कि ऊपर दिए गए अवलोकन को मामले की खूबियों पर राय की अभिव्यक्ति के रूप में नहीं माना जाना चाहिए,” पीठ ने निष्कर्ष निकाला।

