श्री कृष्णा आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर वैद्य करतार सिंह धीमान ने कहा कि भारतीय संस्कृति हमें न केवल ज्ञान प्राप्त करना सिखाती है बल्कि इसे अपने आचरण में लागू करना, आसक्ति से ऊपर उठना और जीवन में संतुलन बनाए रखना भी सिखाती है। उन्होंने कहा कि शास्त्रों का अध्ययन तभी सार्थक होता है जब वह व्यक्ति के विचारों, व्यवहार और कार्यों में सकारात्मक परिवर्तन लाए।
वे विश्वविद्यालय में आयुर्वेद संहिता एवं सिद्धांत स्नातकोत्तर विभाग द्वारा आयोजित संस्कृत सप्ताह समारोह के समापन समारोह में बोल रहे थे। कुलपति ने कहा कि भारतीय संस्कृति के मूल्यों को युवा पीढ़ी तक पहुंचाना हम सबका कर्तव्य है। संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन युवाओं को अनुशासन, आत्म-संयम, बुद्धि और नैतिक मूल्यों को विकसित करने में मदद कर सकता है।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. भीम सिंह वेदलंकर ने कहा कि शास्त्रों का ज्ञान तभी सार्थक होता है जब वह व्यक्ति के व्यवहार और आचरण में परिलक्षित होता है। उन्होंने कहा कि ज्ञान केवल पुस्तकों और शास्त्रों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि आचरण में भी झलकना चाहिए। बड़ी-बड़ी चीजों का त्याग करना आसान हो सकता है, लेकिन छोटी-छोटी चीजों से भी लगाव छोड़ना कठिन है। सच्ची वैराग्यता कठिन परिस्थितियों में शांत रहने की क्षमता से ही सिद्ध होती है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रोफेसर ओम नाथ बिमाली ने कहा कि संस्कृत केवल संचार का साधन नहीं है, बल्कि ज्ञान, विज्ञान और चेतना की भाषा है।

