January 5, 2026
National

उमर खालिद-शरजील इमाम की जमानत खारिज, दंगा पीड़ित परिवारों ने जताया संतोष

Umar Khalid and Sharjeel Imam’s bail rejected, riot victims’ families express satisfaction

दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने पर पीड़ितों और उनके परिजनों ने राहत और संतोष व्यक्त किया है। दंगे में मारे गए राहुल सोलंकी के पिता हरि सोलंकी ने इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वे अदालत के निर्णय के लिए शुक्रगुजार हैं, क्योंकि ऐसे आरोपियों को जमानत मिलना न केवल उनके परिवार के लिए, बल्कि सभी पीड़ितों के लिए एक बड़ा अन्याय होता।

उन्होंने कहा कि जमानत मिलने की स्थिति में पीड़ित परिवारों की सुरक्षा पर भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता था।

हरि सोलंकी ने कहा कि दंगों के समय आम लोगों को इस बात का अंदाजा नहीं था कि हिंसा की तैयारी पहले से ही की जा चुकी थी और यह पूरी तरह से एक साजिश के तहत अंजाम दी गई थी।

उन्‍होंने कहा कि इस हिंसा में शामिल सभी लोग दोषी हैं और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने यहां तक कहा कि ऐसे अपराधियों को फांसी की सजा दी जानी चाहिए। भड़काऊ भाषणों के सवाल पर उन्होंने कहा कि उन्हें किसी खास नेता का नाम तो नहीं पता, लेकिन इस तरह के भाषण समाज को आग में झोंकने का काम करते हैं और इन्हें किसी भी हाल में रोका जाना चाहिए।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर भरोसा जताते हुए कहा कि अगर अपराधियों को जमानत दी जाती है तो यह न्याय की भावना के खिलाफ होगा। हरि सोलंकी ने भावुक होते हुए कहा कि जिसने अपना जवान बेटा या भाई खोया है, वही जान सकता है कि उसके दिल पर क्या गुजरती है।

उन्होंने बताया कि इस दंगे में उनका जवान बेटा मारा गया। इसके साथ ही उन्होंने एक और पीड़ा साझा करते हुए कहा कि वर्ष 2019 से अब तक उनके भाई की विधवा की जमीन पर भू-माफियाओं ने कब्जा कर लिया है। यह जमीन अनुसूचित जाति की होने के बावजूद अवैध तरीके से खरीदी गई और प्रशासन ने अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।

वहीं, दिल्ली दंगों में मारे गए दिनेश के भाई सुरेश ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि अगर ऐसे लोगों को जमानत मिल जाती, तो भविष्य में फिर से दंगे भड़कने का खतरा रहता।

उनके अनुसार, जमानत मिलने से न केवल साजिशें दोबारा रची जा सकती हैं, बल्कि निर्दोष लोगों की जान भी फिर से खतरे में पड़ सकती है। ऐसे आरोपियों को जमानत नहीं मिलनी चाहिए और अगर उन्हें मौत की सजा नहीं दी जा सकती, तो कम से कम उम्रकैद की सजा तो जरूर दी जानी चाहिए।

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