N1Live Entertainment जब नूतन पर लगा था बदसूरत होने का तमगा, मां की दी हिम्मत से बनी हिंदी सिनेमा का चमकता सितारा
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जब नूतन पर लगा था बदसूरत होने का तमगा, मां की दी हिम्मत से बनी हिंदी सिनेमा का चमकता सितारा

When Nutan was branded ugly, her mother's encouragement helped her become a shining star of Hindi cinema.

21 फरवरी । “तुझे क्या सुनाऊं मैं दिलरुबा, तेरे सामने मेरा हाल है, तेरी इक निगाह की बात है, मेरी जिंदगी का सवाल है…” साल 1958 में रिलीज हुई फिल्म ‘आखिरी दांव’ में फिल्माए गए गाने में नूतन की मासूमियत ने दर्शकों को दिल हारने पर मजबूर कर दिया है।

गाने की ये चंद लाइनें आशिकों के दिल का हाल बताने और नूतन की खूबसूरती को बयां करने के लिए काफी हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि नूतन हमेशा अपने रंग-रूप को लेकर असहज रहती थीं? 21 फरवरी को अभिनेत्री की पुण्यतिथि पर हम उनके जीवन से जुड़ी कुछ अहम बातों को जानेंगे।

नूतन, जिन्होंने हिंदी सिनेमा और समाज की हर रुढ़िवादी परंपरा को तोड़ खुद को स्थापित किया और लगातार 4 दशकों तक सिनेमा में सक्रिय रहीं। सिनेमा के कई बड़े स्टार्स उनकी सादगी और खूबसूरती पर फिदा थे, लेकिन एक नूतन थी, जिन्हें भरोसा ही नहीं था कि वे खूबसूरत हैं और कभी फिल्मों में काम भी कर पाएंगी। नूतन को अपनी मां शोभना सामर्थ की तरह ही सिनेमा में धाक जमानी थी और सिनेमा में काम भी करना चाहती थीं, लेकिन अभिनेत्री के परिवार वाले ही उनके रंग-रूप को लेकर ताने कसते थे। शोभना सामर्थ की सहेली रही एक महिला ने नूतन को बदसूरत तक कह दिया था।

नूतन ने खुद इंटरव्यू में खुलासा किया था कि वह फिल्मों में आने का जुनून रखती थी, लेकिन बचपन से ही उन्हें अहसास कराया गया कि वे खूबसूरत नहीं हैं। मां की सहेली ने कहा था कि “तुम्हारी बेटी तुम्हारी जितनी खूबसूरत नहीं है।” यह बात उस वक्त बहुत बुरी लगी थी, लेकिन मां ने समझा दिया था कि इसे तारीफ की तरह लो क्योंकि जैसे ही मैं बड़ी हो जाऊंगी तो मेरा रंग और रूप दोनों निखर जाएंगे, और मैंने इस बात को माना भी था।

शोभना सामर्थ ने अपनी बेटी का हौसला बढ़ाने के लिए खुद मेहनत की। पढ़ने के लिए विदेश भेजा और नूतन का वजन भी कम करवाया और आखिर में फिल्मों में स्थापित करने के लिए बेटी के लिए फिल्म तक बनाई। नूतन ने हिंदी सिनेमा में बतौर बाल कलाकार डेब्यू किया और पहली बार ‘नल दमयन्ती’ में डेब्यू किया, जिसके बाद वे ‘नगीना’ में दिखीं। छोटी उम्र में ही फिल्मों से मिलती सफलता को देखकर रिश्तेदारों के भी सूर बदल गए और वे अभिनेत्री पर गर्व महसूस करने लगे।

महज 14 साल की उम्र में आसिफ की फिल्म मुगल-ए-आजम में अनारकली का रोल ऑफर हुआ था, लेकिन अभिनेत्री ने इस रोल को करने से इनकार कर दिया, क्योंकि उस वक्त तक उनके अंदर आत्मविश्वास की कमी थी। कुछ फिल्में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट करने के बाद नूतन ने एक्टिंग की हर कला को सीखने के लिए विदेश जाने का फैसला लिया। उन्होंने न सिर्फ वहां से पढ़ाई की, बल्कि अपनी इंग्लिश को भी सुधारा। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने साल 1955 में ‘सीमा’ से वापसी की और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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