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जब लखनऊ मुशायरा बना अनवर जलालपुरी के करियर का टर्निंग पॉइंट, यहीं से मिली राष्ट्रीय पहचान

When the Lucknow Mushaira became the turning point in Anwar Jalalpuri's career—earning him national recognition.

कभी-कभी एक छोटा सा मौका किसी इंसान की पूरी जिंदगी बदल देता है। ऐसा ही कुछ हुआ उर्दू शायर अनवर जलालपुरी के साथ। साल 1976 में लखनऊ में एक बड़ा मुशायरा हुआ, जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। इसी मंच ने उन्हें पहली बार बड़े स्तर पर पहचान दिलाई। इस कार्यक्रम में उस समय के राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद भी मौजूद थे। इसी मंच से अनवर जलालपुरी की शायरी को देशभर में पहचान मिलने की शुरुआत हुई।

अनवर जलालपुरी का जन्म 6 जुलाई 1947 को उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर जिले के जलालपुर कस्बे में हुआ था। उनका असली नाम अनवर अहमद था। वे एक साधारण परिवार से आते थे। बचपन में उनके पास ज्यादा सुविधाएं नहीं थीं, लेकिन उन्हें पढ़ने और लिखने का बहुत शौक था। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई अपने ही जिले में की। इसके बाद उन्होंने आजमगढ़ से पढ़ाई की और फिर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया।

पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने साहित्य की दुनिया को चुना। शुरुआत में वे छोटे-छोटे कार्यक्रमों में मंच संचालन का काम किया करते थे। उनकी आवाज और बोलने का तरीका लोगों को बहुत पसंद आने लगा। वे शायरों को मंच पर बुलाने से पहले ऐसा माहौल बनाते थे कि पूरा कार्यक्रम जीवंत हो जाता था।

उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा बदलाव साल 1976 में आया। लखनऊ में एक बड़ा मुशायरा आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में देश के तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद भी शामिल हुए थे। उस समय उनके उस्ताद ने उन पर भरोसा किया और उन्हें पहली बार इतने बड़े मंच पर शायरी पढ़ने का मौका दिया। यह उनके जीवन का पहला बड़ा मौका था।

जैसे ही उन्होंने मंच संभाला, उनकी शायरी और बोलने का अंदाज लोगों को बहुत पसंद आया। इस कार्यक्रम के बाद वे पूरे देश में एक उभरते हुए शायर के रूप में जाने जाने लगे। यही मुशायरा उनके करियर का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बन गया।

इस सफलता के बाद उनका साहित्यिक सफर तेजी से आगे बढ़ने लगा। उन्होंने कई किताबें लिखीं और उर्दू साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी सबसे खास उपलब्धि यह रही कि उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता का उर्दू में अनुवाद किया। उन्होंने इस अनुवाद को शायरी की शक्ल दी। इससे आम लोगों के लिए इसे समझना आसान हो गया।

इसके अलावा उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध किताब ‘गीतांजलि’ का भी उर्दू में अनुवाद किया। उनकी लिखी हुई किताबें जैसे ‘खारे पानी का सिलसिला’, ‘खुशबू की रिश्तेदारी’ और ‘रोशनाई के सफीर’ भी लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुईं। अनवर जलालपुरी को अपने काम के लिए कई सम्मान भी मिले। उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें यश भारती पुरस्कार से सम्मानित किया। बाद में उनके काम को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली और उन्हें पद्मश्री जैसे सम्मान से भी नवाजा गया।

अपने जीवन के आखिरी वर्षों में वे स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते रहे और 70 साल की उम्र में 2 जनवरी 2018 को उनका निधन हो गया।

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