युद्ध नायकों के आश्रितों के लिए प्रथम श्रेणी और द्वितीय श्रेणी के पदों पर नियुक्ति का प्रावधान करने वाली नीति बनाए जाने के लगभग 27 साल बाद, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने नीति निर्देशों को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। पीठ ने इस प्रकार की नियुक्तियों को सामान्य अनुकंपा रोजगार से अलग बताया और युद्ध नायकों द्वारा किए गए सर्वोच्च बलिदान के प्रति राष्ट्रीय स्तर पर कृतज्ञता व्यक्त करने के रूप में इनके महत्व को रेखांकित किया।
न्यायमूर्ति संदीप मौदगिल ने टिप्पणी की कि 19 अगस्त, 1999 की नीति का उद्देश्य “युद्ध नायक द्वारा किए गए सर्वोच्च बलिदान को उचित मान्यता देना” और “सम्मान और कृतज्ञता” के प्रतीक के रूप में नियुक्तियां प्रदान करना था। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, “इस तरह की नियुक्ति को केवल आश्रित परिवार के सदस्यों को जीविका प्रदान करने के उद्देश्य से नहीं देखा जा सकता है,” बल्कि यह “एक ‘युद्ध नायक’ द्वारा बलिदान किए गए जीवन के प्रति एक कृतज्ञ राष्ट्र की कृतज्ञता की अभिव्यक्ति” है।
‘निर्भरता पराई और अप्रासंगिक है’ सुनवाई के दौरान, पीठ को सूचित किया गया कि पंजाब राज्य ने पंजाब लोक सेवा आयोग के दायरे से ऐसे पदों को बाहर रखते हुए युद्ध नायकों के आश्रितों के लिए प्रथम और द्वितीय श्रेणी की नियुक्तियों का प्रावधान करने वाले विवादित नीतिगत निर्देश जारी किए थे।
न्यायमूर्ति मौदगिल ने इस नीति को सामान्य अनुकंपा नियुक्तियों से अलग बताया, जिनका उद्देश्य सेवा के दौरान मरने वाले सरकारी कर्मचारी के परिवार को तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान करना और अचानक आए वित्तीय संकट से उबरने में उनकी मदद करना है। न्यायमूर्ति मौदगिल ने 6 अक्टूबर, 2010 को एक समन्वय पीठ द्वारा दिए गए फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि “निर्भरता का कारक या तथ्य असाधारण परिस्थितियों से निपटने के लिए लिए गए इस तरह के असाधारण निर्णयों के लिए पराया और अप्रासंगिक है”।
उच्च न्यायालय ने उमेश कुमार नागपाल बनाम हरियाणा राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर याचिकाकर्ताओं के भरोसे की भी जांच की। “उक्त निर्णय अनुकंपा नियुक्ति के सिद्धांतों को निर्धारित करता है, जिसका मूल उद्देश्य सेवा के दौरान शहीद हुए कर्मचारी के परिवार को तत्काल वित्तीय सहायता प्रदान करना और उन्हें अचानक आए वित्तीय संकट से उबरने में सक्षम बनाना है। हालांकि, वर्तमान मामले में चुनौती दी गई नीति विशेष रूप से उन युद्ध नायकों के आश्रितों के लिए बनाई गई है जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया है या विकलांगता का शिकार हुए हैं और जैसा कि राज्य द्वारा तर्क दिया गया है, यह अनुकंपा नियुक्ति की सामान्य योजना से अलग है,” पीठ ने आगे कहा।
न्यायमूर्ति मौदगिल ने टिप्पणी की कि यह निर्णय, “यद्यपि अपने क्षेत्र में बाध्यकारी है, लेकिन केवल इसलिए किसी अलग वैधानिक/नीतिगत व्यवस्था को अमान्य नहीं कर सकता क्योंकि वह व्यवस्था आश्रितों को नियुक्ति प्रदान करती है”। पीठ ने आगे कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में यह निर्धारित नहीं किया गया है कि किसी विशेष नीति के तहत राज्य द्वारा किसी विशिष्ट वर्ग के पक्ष में की गई प्रत्येक नियुक्ति को अनिवार्य रूप से अनुकंपा रोजगार के रूप में परखा जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने इस नीति को चुनौती देते हुए इसके तहत रोजगार की मांग की। न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं द्वारा मांगी गई राहतों में एक मूलभूत कठिनाई पाई। याचिकाकर्ताओं ने 19 अगस्त, 1999 और 24 सितंबर, 1999 के नीतिगत निर्देशों को रद्द करने की मांग की, साथ ही उन्होंने उसी नीति के तहत प्रथम और द्वितीय श्रेणी की नियुक्तियों के लिए अपने दावों पर भी विचार करने की मांग की, जिसे वे रद्द करवाना चाहते थे।
पीठ ने कहा, “इस तरह की असंगत राहतें एक साथ नहीं दी जा सकतीं,” और आगे कहा, “एक बार जब फाउंडेशन पॉलिसी को ही चुनौती दी जाती है, तो वैकल्पिक प्रार्थना का कोई महत्व नहीं रह जाता।” याचिकाकर्ताओं द्वारा अपनी रिट याचिका के अधिकार क्षेत्र के तहत हस्तक्षेप के लिए आधार स्थापित करने में विफल रहने का हवाला देते हुए, उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी।


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