March 5, 2026
Entertainment

भीमसेन जोशी की ‘अक्का’ गंगूबाई हंगल, जिन्होंने ‘गुरु बंधु’ को दी रागों की तालीम

Bhimsen Joshi’s ‘Akka’ Gangubai Hangal, who taught ragas to ‘Guru Bandhu’

5 मार्च । भारतीय शास्त्रीय संगीत की महान विभूतियों का जब भी जिक्र होगा तो डॉ. गंगूबाई हंगल का नाम सामने जरूर आएगा। उनकी स्वर और सुर की गहराई ने किराना घराने को नई पहचान दी। वह कर्नाटक की पहली ऐसी महिला गायिका थीं, जिन्होंने मुश्किल भरे दौर में संघर्षों से लड़ते हुए देशभर में संगीत से नाम कमाया और कर्नाटक का गौरव बढ़ाया।

सामाजिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने मेहनत और लगन से महानता हासिल की। गंगूबाई की दादी कर्नाटकी संगीत गाती थीं, लेकिन गंगूबाई को वह पसंद नहीं आई। इसलिए वह कुदगोल गांव पहुंचीं और सवाई गंधर्व से संगीत की तालीम ली। सवाई गंधर्व ने उन्हें बहुत लगन से सिखाया।

गंगूबाई का भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी से गुरु-बंधु का रिश्ता था और वह उन्हें ‘अक्का’ कहकर बुलाते थे। उनसे जुड़ा एक किस्सा भी है। और भीमसेन जोशी गुरु-बंधु थे, लेकिन गंगूबाई बड़ी थीं। भीमसेन जोशी अक्सर पानी भरते हुए या स्टेशन पर बैठकर गंगूबाई से सवाल पूछते और उन्हें ‘अक्का-अक्का’ कहकर पुकारते और पूछते, “ये राग कैसा चलता है? गुरुजी ने आपको कैसे बताया?” गंगूबाई उन्हें सब कुछ बताती थीं।

संगीत जगत की कई हस्तियों का मानना है कि गंगूबाई के गायन के बाद दूसरों को गाना बहुत मुश्किल हो जाता था। इतना सुरीला और प्रभावशाली था उनका स्वर। गंगूबाई का व्यक्तित्व बहुत सीधा-सादा और डाउन टू अर्थ था। उनका परिवार भी बहुत अच्छा था। उन्होंने मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, पूरे भारत और विदेशों खासकर फ्रांस में खूब नाम कमाया कि आज भी लोग उनके गायन और माहौल को याद करते हैं।

उन्होंने अपना पूरा जीवन संगीत को समर्पित कर दिया। उनका एक महान कार्य है हुबली में डॉ. गंगूबाई हंगल गुरुकुल की स्थापना। उनकी इच्छा थी कि आने वाली पीढ़ी को वे कष्ट न झेलने पड़ें जो उन्होंने झेले। इसलिए उन्होंने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा से अनुरोध किया था। मुख्यमंत्री ने तुरंत 5 करोड़ रुपए का ऐलान किया और यह गुरुकुल बना। यह पूरे भारत में एकमात्र सरकारी गुरुकुल है, जहां गुरु-शिष्य परंपरा से संगीत सिखाया जाता है। 12 साल से चल रहे इस गुरुकुल से कई अच्छे कलाकार निकल रहे हैं और यहां पढ़ाने वाले शिक्षक भी महान गायक हैं। इसे कर्नाटक की शान भी कहा जाता है, जो गंगूबाई की देन है।

पद्म विभूषण जैसी उपाधियां उनके संगीत ज्ञान के आगे कुछ भी नहीं। उन्होंने शिष्यों पर कठोर रियाज करवाया, सार्वजनिक जीवन का मूल्य सिखाया और कई कलाकारों को जीवन का मार्ग दिखाया। अंतःकरणीय और मानवीय व्यक्तित्व वाली गंगूबाई ने चौथी कक्षा तक पढ़ाई के बाद परिश्रम से अंतरराष्ट्रीय सम्मान पाया। सरकार ने उनके नाम पर मैसूर में डॉ. गंगूबाई हंगल यूनिवर्सिटी ऑफ म्यूजिक एंड फाइन आर्ट्स, हुबली में गुरुकुल और धारवाड़ में पीठ स्थापित की।

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