कर्नाटक में हिंदू राष्ट्र समन्वय समिति के राज्य संयोजक मोहन गौड़ा के खिलाफ बेंगलुरु के व्हाइटफील्ड पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर को लेकर विवाद गहरा गया है। समिति ने पुलिस कार्रवाई की कड़ी आलोचना करते हुए इसे लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला बताया है। संगठन ने एफआईआर को तत्काल वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि वह इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ेगा और न्यायालय से न्याय मिलने का भरोसा है।
हिंदू राष्ट्र समन्वय समिति का कहना है कि किसी विवादास्पद कार्यक्रम को रद्द करने के लिए पुलिस को शांतिपूर्वक ज्ञापन सौंपना और अपनी आपत्ति दर्ज कराना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। संगठन के अनुसार, जनहित में पुलिस को याचिका देना या किसी कार्यक्रम के खिलाफ लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराना अपराध नहीं माना जा सकता।
समिति ने आरोप लगाया कि सोशल मीडिया पर व्यक्त राय को “अफवाह” और “गलत सूचना” बताकर गैरजमानती धाराओं में मामला दर्ज करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनावश्यक अंकुश है।
संगठन ने यह भी कहा कि हिंदू देवी-देवताओं, हिंदू धर्म और करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का अपमान करने वाले कार्यक्रमों पर आपत्ति जताना पूरी तरह वैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। ऐसे मामलों में विरोध दर्ज कराने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना गलत संदेश देता है।
दूसरी ओर, व्हाइटफील्ड पुलिस स्टेशन में तैनात पुलिसकर्मी श्रीधर रेलेकर की रिपोर्ट के आधार पर मामला दर्ज किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग के दौरान 1 अगस्त 2026 को मोहन गौड़ा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट किए गए एक वीडियो और उससे संबंधित पोस्ट का संज्ञान लिया गया।
पुलिस का आरोप है कि वीडियो में कुणाल कामरा के प्रस्तावित कॉमेडी शो को लेकर पुलिस की कार्रवाई के संबंध में ऐसे दावे किए गए, जिनसे जनता में भ्रम फैल सकता था। साथ ही पोस्ट में यह भी कहा गया कि विरोध के बाद कार्यक्रम को व्हाइटफील्ड से कोरमंगला स्थानांतरित कर दिया गया।
पुलिस का आरोप है कि सोशल मीडिया के माध्यम से झूठी और भ्रामक जानकारी प्रसारित कर जनता में अफवाह फैलाने तथा किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से गलत सूचना देने का प्रयास किया गया। इसी आधार पर मामला दर्ज किया गया है।
उधर, हिंदू राष्ट्र समन्वय समिति ने मांग की है कि मोहन गौड़ा के खिलाफ दर्ज एफआईआर तत्काल वापस ली जाए, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाए, शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने वाले नागरिकों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार बंद हो तथा राज्य सरकार और पुलिस कानून के कथित दुरुपयोग को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए।


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