March 23, 2026
National

प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पीके मिश्रा ने ‘वॉटर, नेचर, प्रोग्रेस: सॉल्यूशंस फॉर अ न्यू इंडिया’ पुस्तक का किया विमोचन

Dr. PK Mishra, Principal Secretary to the Prime Minister, released the book ‘Water, Nature, Progress: Solutions for a New India’

23 मार्च । नई दिल्ली में विश्व जल दिवस पर आयोजित एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव डॉ. पीके मिश्रा ने ‘वॉटर, नेचर, प्रोग्रेस: सॉल्यूशंस फॉर अ न्यू इंडिया’ पुस्तक का विमोचन किया। इस पुस्तक को परमेश्वरन अय्यर, अरुणाभा घोष और रिचर्ड दमानिया ने लिखा है और हार्परकॉलिन्स पब्लिशर्स इंडिया ने प्रकाशित किया है। यह पुस्तक गर्म होती दुनिया में पानी को भारत की सबसे कमजोर कड़ी और सबसे बड़े अनछुए अवसर के रूप में रेखांकित करती है।

डॉ. पीके मिश्रा ने अपने मुख्य भाषण में कहा, “जैसे-जैसे भारत ‘विकसित भारत 2047’ की ओर बढ़ रहा है, हमारी कृषि उत्पादकता, शहरी जीवन स्तर, ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु लचीलेपन (क्लाइमेट रेजिलिएंस) के लिए जल प्रबंधन अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। यह बेहतरीन किताब नीति, अर्थशास्त्र और क्रियान्वयन के विशेषज्ञों के दुर्लभ तालमेल को एक साथ लाती है, ताकि एक ठोस और प्रभावशाली ढांचा पेश किया जा सके। यह दर्शाती है कि कैसे पानी, विकास की बाधा बनने के बजाय सतत विकास के अवसर में बदल सकता है। यह पुस्तक इस बात पर जोर देती है कि बड़े पैमाने पर सार्थक प्रगति तभी संभव है जब एक मजबूत प्रशासनिक रूपरेखा का सशक्त संस्थागत क्षमता और निरंतर सार्वजनिक निवेश के साथ अनुरूपता हो।”

पवित्र नदियों से लेकर मानसून के उत्सवों तक, पानी के साथ गहरे सांस्कृतिक जुड़ाव के बावजूद भारत के पास दुनिया के ताजे जल के संसाधनों का सिर्फ चार प्रतिशत हिस्सा है, जबकि आबादी वैश्विक जनसंख्या का 18 प्रतिशत है। इसी संदर्भ में ‘वॉटर, नेचर, प्रोग्रेस’ पुस्तक इस चुनौती का विश्लेषण करने और आगामी व्यावहारिक उपायों को सामने लाने के लिए आंकड़ों, नीतिगत विचारों और वास्तविक दुनिया के उदाहरणों को आपस में जोड़ती है।

पुस्तक की प्रस्तावना में मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने कहा, “यह पुस्तक एक ऐसे महत्वपूर्ण समय पर आई है, जब भारत को यह तय करना होगा कि जल हमारी प्रगति में अड़चन बना रहेगा या परिवर्तन का इंजन बनेगा। लेखकों ने बहुत ही प्रभावशाली ढंग से तर्क दिया है कि जल केवल एक पर्यावरणीय चिंता भर नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कारक (मैक्रोइकॉनॉमिक वेरिएबल) है।”

एक बुनियादी संसाधन के रूप में पानी का हमारे स्वास्थ्य, ऊर्जा, कृषि, शहरीकरण, बुनियादी ढांचे, विनिर्माण और मानव विकास पर प्रभाव बहुत व्यापक है। यह इसके प्रबंधन को देश के भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बना देता है, लेकिन हम इस पर रणनीतिक रूप से ध्यान देने में विफल रहे हैं। ऐसे में तेजी से गर्म होती दुनिया में पानी भारत की सबसे कमजोर कड़ी बन सकता है। मौजूदा मुद्दे काफी जटिल हैं। इनमें कृषि, औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों के बीच जल के समान वितरण की जरूरत शामिल है। इसके साथ, दोषपूर्ण जल प्रबंधन के प्रभाव, बढ़ता शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां भी इसमें जुड़ी हुई हैं। हालांकि, सही ढंग से प्रबंधन करने पर यह सतत आर्थिक परिवर्तन का एक बड़ा आधार बन सकता है।

लेखक परमेश्वरन अय्यर कहते हैं, “जल सुधार असल में प्रशासनिक सुधार है। पाइप, पंप और जलाशय बनाए जा सकते हैं, लेकिन भरोसेमंद संस्थानों, पारदर्शी मूल्य निर्धारण और नागरिकों के विश्वास के बगैर प्रणालियों को लंबे समय तक नहीं चलाया जा सकता। हमें आंकड़ों को जोड़ने, जल-वितरण सेवाओं को मजबूत बनाने, सततशीलता के लिए लागत-निकासी सुनिश्चित करने और जिम्मेदारीपूर्ण जल प्रबंधन के लिए स्थानीय सरकारों को सशक्त बनाने की जरूरत है। जब शासन सुधरता है तो सेवा वितरण भी सुधरता है और सेवा वितरण में सुधार होने पर भारतीय नागरिक जल को केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि संरक्षित करने योग्य एक साझा संसाधन मानना शुरू कर देते हैं।”

लेखक अरुणाभा घोष कहते हैं, “आगामी दशकों में जल भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षा की सख्त सीमाओं और वास्तविक संभावनाओं को परिभाषित करेगा। यह तय करेगा कि कहां पर शहरों का विस्तार हो सकता है, कौन से उद्योग बचे रह सकतेहैं, और जलवायु के बढ़ते झटकों का हमारी खेती कैसे सामना कर सकती है। असली सवाल यह नहीं है कि क्या भारत के पास पर्याप्त मात्रा में पानी है, बल्कि यह है कि क्या हम इसे व्यापक आर्थिक नियोजन (मैक्रोइकॉनॉमिक प्लानिंग), औद्योगिक एवं कृषि नीति और जलवायु लचीलेपन में शामिल एक रणनीतिक संसाधन के रूप में मान्यता देने के लिए तैयार हैं। हमें पानी को ‘निकालने, उपयोग करने और बहा देने’ के रैखिक मॉडल से हटकर चक्रीयता (सर्कुलैरिटी), पुनर्उपयोग और धन सृजन पर आधारित मॉडल की दिशा में बढ़ना चाहिए। अगर इस काम को सही ढंग से किया जाए तो जल एक बाधा बनने की जगह पर नवाचार, दक्षता, नए बिजनेस मॉडल और सतत संपन्नता का शक्तिशाली इंजन बन सकता है। पानी केवल किसी एक क्षेत्र की चिंता नहीं है; यह पूरी तरह से भारत के आर्थिक भविष्य की धमनियों में बहता है।”

लेखक रिचर्ड दमानिया कहते हैं, “ग्रीन वॉटर, जो मिट्टी में संचित नमी है और स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र के जरिए बनी रहती है, भारत का सबसे ज्यादा अनदेखी वाला संसाधन है। भले ही नीतिगत बहसें नदियों, बांधों और भूजल दोहन पर केंद्रित होती हैं, लेकिन फसलों को पोषण देने वाली अधिकांश बारिश कभी भी पाइप या नहरों के माध्यम से नहीं बहती है। बंजर भूमि सुधार, मृदा स्वास्थ्य सुधार, वन संरक्षण और बेहतर जलक्षेत्रों (वॉटरशेड) प्रबंधन जैसे कदमों के जरिए, हम जलभृतों (एक्विफर्स) से एक भी अतिरिक्त बूंद को निकाले बगैर कृषि उत्पादकता और उसकी सहनशक्ति में व्यापक बढ़ोतरी कर सकते हैं। ‘ग्रीन वॉटर’ का कुशलतापूर्ण प्रबंधन जल सुरक्षा के सबसे किफायती उपायों में से एक है।”

कार्यकारी प्रकाशक उदयन मित्रा कहते हैं, “आज भारत और इस धरती के लिए, जल एक महत्वपूर्ण संसाधन है, और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी यह अत्यंत महत्वपूर्ण रहने वाला है। जल संसाधनों का प्रभावी, न्यायसंगत और सतत उपयोग हमारी नीति निर्माण और कार्यान्वयन का एक प्रमुख हिस्सा होना चाहिए। इस संदर्भ में ‘वॉटर, नेचर, प्रोग्रेस’ एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रकाशन है। हार्परकॉलिन्स इस किताब को हर जगह के पाठकों तक पहुंचाकर काफी खुश है।”

परमेश्वरन अय्यर विश्व बैंक में कार्यकारी निदेशक हैं। इससे पहले वे नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) थे। 1981 बैच के आईएएस अधिकारी, अय्यर भारत सरकार के पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय में सचिव भी रह चुके हैं, जिनकी देखरेख में देश के एक प्रमुख कार्यक्रम ‘स्वच्छ भारत मिशन’ का कार्यान्वयन हुआ था। अय्यर दो अन्य पुस्तकों के लेखक भी हैं।

अरुणाभा घोष एक प्रमुख वैश्विक सततता और विकास थिंक टैंक, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के संस्थापक-सीईओ हैं। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ, लेखक और संस्थान निर्माता हैं, जिन्होंने भारत और पचास से अधिक अन्य देशों में जलवायु, ऊर्जा और विकास नीति से जुड़ी चर्चाओं को आकार देने में भूमिका निभाई है।

रिचर्ड दमानिया विश्व बैंक की प्लैनेट वाइस प्रेसीडेंसी में मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। उन्होंने विश्व बैंक के कई विभागों और क्षेत्रों में मुख्य अर्थशास्त्री, वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार और लीड इकोनॉमिस्ट जैसे वरिष्ठ पदों पर कार्य किया है। विश्व बैंक से जुड़ने से पहले, वे एडिलेड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे।

विश्व बैंक समूह के वॉटर ग्लोबल प्रैक्टिस के ग्लोबल डायरेक्टर सरोज कुमार झा ने कहा, “नागरिक, सेवाओं के वितरण (सर्विस डिलीवरी) को तवज्जो देते हैं। यह पुस्तक सम्यता के दृष्टिकोण का उपयोग करती है, जिसमें छोटे किसानों के साथ-साथ अक्सर भुला दिए जाने वाले अर्ध-शहरी क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। यह सभी के लिए गुणवत्तापूर्ण जल और स्वच्छता सेवाएं उपलब्ध कराने के व्यावहारिक उपायों की जानकारी देती है। इस पुस्तक में प्रस्तुत विचारों और सभी के लिए जल-सुरक्षित विश्व का लक्ष्य पाने के विश्व बैंक समूह के रणनीतिक उद्देश्य के बीच काफी समानताएं हैं।”

शिव नादर विश्वविद्यालय के विशिष्ट प्रोफेसर मिहिर शाह ने कहा, “भारत के बहुत से नीति निर्माताओं ने मांग पक्ष पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करते हुए जल प्रबंधन और प्रशासन में आमूलचूल बदलाव लाने का लगातार समर्थन किया है। यह एक शानदार पुस्तक है, जो इस बदलाव को तुरंत लागू करने के पक्ष में एक ठोस तर्क देती है।”

गेट्स फाउंडेशन के ग्लोबल ग्रोथ एंड अपॉर्चुनिटी के अध्यक्ष हरि मेनन ने कहा, “एक नई हरित क्रांति के लिए, भारत की मिट्टी में मौजूद ‘ग्रीन वॉटर’ के विशाल संसाधन का इस्तेमाल रोमांचक होगा, जो खाद्य सुरक्षा, पोषण सुरक्षा और पर्यावरणीय सततशीलता को जोड़ सकता है। यह पुस्तक इसके लिए ‘क्यों, क्या और कैसे’ की व्याख्या पेश करती है।”

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