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फरहान अख्तर के जीवन में ‘दूसरा प्यार’ बेहद अहम, जो दूर करता है तनाव

Farhan Akhtar's 'second love' is very important in his life, it relieves stress.

मुंबई में जन्मे फरहान अख्तर सिर्फ बॉलीवुड के बड़े अभिनेता और निर्देशक ही नहीं हैं, बल्कि एक ऐसे शख्स हैं, जिनकी जिंदगी में कला और खेल दोनों का खास महत्व है। बचपन से ही फरहान ने जिंदगी को खुलकर जिया और अपने माता-पिता से सीखा कि जीवन में सवाल पूछना और नया सीखना कितना जरूरी है। उनके पिता जावेद अख्तर और मां हनी ईरानी ने उन्हें कभी भी किसी धर्म या समाज की बंदिशों में नहीं रखा।

यही वजह है कि फरहान ने हर चीज में अपनी स्वतंत्र सोच और जुनून को अपनाया। बचपन में वह अक्सर दोस्तों के साथ क्रिकेट और फुटबॉल खेलते थे। वह इन्हें अपनी जिंदगी का दूसरा प्यार बताते हैं। आज भी उनके लिए स्पोर्ट्स सिर्फ खेल नहीं, बल्कि तनाव दूर करने और रिलैक्स होने का सबसे बड़ा जरिया हैं।

फरहान अख्तर का जन्म 9 जनवरी 1974 को मुंबई में हुआ था। उनके पिता, जावेद अख्तर, एक प्रसिद्ध गीतकार और स्क्रीनप्ले राइटर हैं, जबकि उनकी मां, हनी ईरानी, भी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी रही हैं। उन्होंने बचपन से ही सवाल करना और चीजों की जड़ तक पहुंचना सीखा। यही सोच उनके करियर में भी दिखती है। एक सहायक निर्देशक के तौर पर उन्होंने बॉलीवुड में सफर शुरू किया।

उन्होंने पहले ‘लम्हे’ (1991) और ‘हिमालय पुत्र’ (1997) में असिस्टेंट डायरेक्टर के रूप में काम किया। इसके बाद, उन्होंने ‘दिल चाहता है’ (2001) से अपने निर्देशन की शुरुआत की। इस फिल्म ने न केवल युवाओं के बीच लोकप्रियता हासिल की, बल्कि फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। इसके बाद उन्होंने ‘लक्ष्य’ (2004) और ‘डॉन’ (2006) जैसी फिल्मों का निर्देशन किया, जिनमें उनकी रचनात्मकता और नई सोच साफ दिखाई देती थी।

हालांकि, फरहान के करियर की एक खास बात यह है कि वह सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं रहे। उन्होंने एक्टिंग में भी कदम रखा और ‘रॉक ऑन!!’ (2008) से अपने अभिनय का सफर शुरू किया। इसके बाद उन्होंने ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’ (2011) और ‘भाग मिल्खा भाग’ (2013) जैसी फिल्मों में शानदार प्रदर्शन किया। इन फिल्मों ने उन्हें फिल्मफेयर और अन्य कई पुरस्कार दिलाए।

फरहान अख्तर का खेलों के प्रति प्रेम उनके प्रोफेशनल जीवन में भी दिखाई देता है। अक्सर वह शूटिंग के बीच क्रिकेट या फुटबॉल खेलते हुए नजर आते हैं। उन्होंने कई बार अपने इंटरव्यू में कहा कि जब वह फिल्मों के स्ट्रेस और व्यस्तता से थक जाते हैं, तो फुटबॉल खेलना उन्हें ताजगी और ऊर्जा देता है। वह अपने जीवन में खेलों को हमेशा एक प्राथमिकता मानते हैं।

फरहान ने अपने करियर में संगीत में भी पहचान बनाई। उन्होंने ‘सेनोरिटा’, ‘पिछले सात दिनों में’, ‘तुम हो तो’, ‘यहां वहां’, ‘अंतरंगी यारी’, और ‘सोचा है’ जैसे गानों से संगीत प्रतिभा को साबित किया। साथ ही, उन्होंने एक्सल एंटरटेनमेंट जैसे प्रोडक्शन हाउस की शुरुआत की।

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