उत्तर प्रदेश कैडर की पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने मंगलवार को राजनीति में उतरने का ऐलान किया। करीब 13 साल की प्रशासनिक सेवा के बाद आईएएस से इस्तीफा देने वाली दिव्या मित्तल ने कहा कि वह लोगों की आवाज बनने के लिए राजनीति में आ रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी राजनीतिक यात्रा उत्तर प्रदेश से होगी और वह किसी स्थापित राजनीतिक दल के साथ जुड़ने के बजाय अपनी राह बनाने की दिशा में आगे बढ़ेंगी।
सोशल मीडिया पर जारी करीब 10 मिनट के वीडियो संदेश में दिव्या मित्तल ने कहा, “नमस्कार, मैं दिव्या मित्तल! अभी कुछ दिन पहले मैंने आईएएस से त्यागपत्र दिया और आपके मन में कई सवाल छोड़ दिए। कुछ दिनों तक जवाब नहीं दिया, क्योंकि काम बड़ा था और मैं हौसला जुटा रही थी। पर आज उन सवालों के जवाब देने आई हूं। आगे क्या? किसके साथ और कहां से?” उन्होंने कहा, “पहला सवाल: आगे क्या? राजनीति! लोगों ने मुझे कहा कि तुम सब कुछ तो बन गईं, अब और क्या बनना है? मुझे आवाज बनना है। उन लोगों की आवाज, जिनकी आवाज किसी दफ्तर तक नहीं पहुंच पाती और अगर पहुंच भी जाए तो सुनी नहीं जाती। उन लोगों की तरफ से मुझे अपने देश की आजादी के 80 सालों का हिसाब चाहिए।”
अपने प्रशासनिक कार्यकाल का उदाहरण देते हुए दिव्या मित्तल ने मीरजापुर के लहुरियादह गांव का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि एक बार पहाड़ी पर पानी पहुंचाने के लिए निरीक्षण के दौरान एक महिला उनके पास आई और उसने पेंशन या मकान के बजाय गांव में पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई के लिए स्कूल की मांग की। उन्होंने कहा, “उस वक्त तक उस महिला के घर में पानी नहीं था लेकिन उसने स्कूल मांगा। मैंने नियम देखे, स्कूल मंजूर किया। आज 3 साल बीत जाने के बाद वह स्कूल बनना शुरू नहीं हुआ। अब मुझे बताइए कि क्या नहीं था? पैसा नहीं था, नियम नहीं था, स्वीकृति नहीं थी? बस इरादा नहीं था!”
उन्होंने कहा, “अगर इरादा होता तो पहाड़ भी रास्ता दे देता, और इरादा नहीं था तो एक फाइल ही पहाड़ बन गई। मुझे उन गायब स्कूलों का हिसाब चाहिए।” दिव्या मित्तल ने राजस्व विभाग में विशेष सचिव रहते हुए एक भूमिहीन व्यक्ति से जुड़ा मामला भी साझा किया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति सरकारी जमीन का पट्टा मिलने के बावजूद कब्जा नहीं मिलने की शिकायत लेकर उनके पास आया था। उनके अनुसार, दस्तावेज देखने पर संबंधित रिपोर्ट गलत पाई गई और अधिकारी से बात करने के बाद रिपोर्ट वापस कराई गई तथा कार्रवाई भी हुई। हालांकि, जमीन पर कब्जा दिलाने के मामले में उन्हें कथित तौर पर यह जवाब मिला कि “ऊपर से मना किया गया है।”
उन्होंने सवाल किया, “यह ऊपर कौन है? संविधान तो कहता है कि सबसे ऊपर लोग हैं। तो उसे न्याय के लिए इधर-उधर क्यों भटकना पड़ रहा है? जो ऊपर से दिया जाए, वह कृपा और न्याय तो हक है। तो मुझे उन पन्नियों में लिपटे अन्याय का हिसाब चाहिए।” सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने कहा कि हजारों गांवों में आज भी सड़क नहीं है, नदी होने के बावजूद पुल नहीं है और बारिश में गांव टापू बन जाते हैं। उन्होंने सड़कों के गड्ढों का जिक्र करते हुए कहा कि अधिकारियों को इन समस्याओं और उनसे जुड़ी फाइलों तथा मौतों के आंकड़ों की जानकारी होती है, लेकिन “फिक्र” नहीं होती।
उन्होंने कहा, “और जब फिक्र नहीं होती तो मौत हादसा नहीं, फैसला होती है। मुझे उन मौतों का हिसाब चाहिए।” दिव्या मित्तल ने अपने इस्तीफे के बाद लिखी पंक्ति का भी जिक्र किया। उनका इस्तीफा केंद्र सरकार ने सितंबर में स्वीकार किया था और 15 सितंबर 2026 से प्रभावी हुआ था। इसके बाद उन्होंने कवि जयशंकर प्रसाद के नाटक ‘चंद्रगुप्त’ की पंक्ति लिखी थी- “प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो।”
दिव्या मित्तल ने अपने वीडियो संदेश में लोगों से व्हाट्सऐप के जरिए जुड़ने की अपील भी की है। इससे उनकी प्रस्तावित राजनीतिक गतिविधियों में सीधे जनसंवाद और डिजिटल माध्यम की भूमिका का संकेत मिलता है। उनका राजनीति में प्रवेश ऐसे समय हुआ है जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की तैयारियां तेज हो चुकी हैं। हालांकि दिव्या मित्तल ने अपने संदेश में किसी राजनीतिक दल से जुड़ने की घोषणा नहीं की है बल्कि उत्तर प्रदेश से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने की बात कही है।

