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समाज में महत्वाकांक्षी महिलाओं को पूरी तरह स्वीकार करना आज भी मुश्किल : सबा आजाद

It is still difficult to fully accept ambitious women in society: Saba Azad

अभिनेत्री सबा आजाद ने कहा कि आज भी समाज में महत्वाकांक्षी महिलाओं को पूरी तरह स्वीकार करना आसान नहीं है। उन्होंने माना कि बराबरी और प्रगति की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन असल जिंदगी में महिलाओं को खुद को साबित करने के लिए पुरुषों से कहीं ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है।

आईएएनएस से खास बातचीत में अभिनेत्री ने कहा कि हमारा सामाजिक ढांचा लंबे समय से पुरुषों की सफलता को ध्यान में रखकर बना है। ऐसे में महिलाओं को अपनी पहचान बनाने के लिए दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है।

जब उनसे पूछा गया कि क्या आज भी समाज महत्वाकांक्षी महिलाओं को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता, तो सबा ने कहा कि हम अब भी पुरुष प्रधान समाज में जी रहे हैं। महिलाओं को लेकर बहुत जल्दी राय बना ली जाती है और उन्हें हर कदम पर खुद को साबित करना पड़ता है।

उन्होंने कहा, “महिलाओं को खुद को साबित करने के लिए अक्सर दोगुनी मेहनत करनी पड़ती है। हम आज भी एक पितृसत्तात्मक समाज में रहते हैं, जहां महिलाओं की बात आते ही लोग बहुत जल्दी राय बना लेते हैं। हमारे देश के कई हिस्सों में, महिलाओं को आज भी आजादी से काम करने या अपने फैसले खुद लेने की इजाज़त नहीं है। शहरों में शायद हमें यह सच्चाई हमेशा न दिखे, लेकिन यह मौजूद है। इसलिए महिलाओं को लगातार खुद को साबित करना पड़ता है – न सिर्फ़ अपने काम की जगह पर, बल्कि घर पर भी। अगर वे काम करती हैं, तो उन पर उंगलियां उठती हैं। अगर वे काम नहीं करतीं, तो भी उन पर उंगलियां उठती हैं।

सबा ने आगे कहा कि महिलाओं से उम्मीदें कभी खत्म नहीं होतीं। यही वजह है कि उनका संघर्ष और भी कठिन हो जाता है।

पुरुषों के अहम पर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि समाज अब भी पुरुष प्रधान सोच के तहत चलता है। कई पुरुषों को बचपन से यह सिखाया जाता है कि वे महिलाओं से बेहतर हैं। ऐसे में जब वे मजबूत और आत्मनिर्भर महिलाओं को देखते हैं, तो उनकी सोच को चुनौती मिलती है और उनका अहम आहत हो सकता है।

हालांकि, सबा का मानना है कि बदलाव सीखने से आता है। उन्होंने कहा कि सच को स्वीकार करने से ही समाज आगे बढ़ सकता है। उनके मुताबिक, मजबूत महिलाओं से हमेशा कुछ नया सीखने को मिलता है।

उन्होंने कहा, “जब भी मैं किसी मजबूत महिला से मिलती हूं, तो मेरी पहली सोच यही होती है कि मैं उससे कुछ सीखूं। महिलाएं एक साथ कई काम बहुत आसानी से कर लेती हैं और उनमें एक ऐसी भावनात्मक मजबूती होती है, जिसे समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता है। उनसे सीखने के लिए बहुत कुछ है।”

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