July 13, 2026
Entertainment

मास्टर सलीम : पिता की डांट बनी सबसे बड़ी सीख, छोटी सी उम्र से शुरू हुई सुरों की साधना; ऐसे बने दुनिया के ‘मास्टर सलीम’

Master Saleem: His father’s scolding became his greatest lesson, and his musical journey began at a tender age; this is how he became the world-renowned ‘Master Saleem’.

भारतीय संगीत इतिहास में कुछ ऐसे कलाकार हुए हैं, जिन्होंने अपनी कला को व्यावसायिकता से ऊपर उठाकर एक आध्यात्मिक और रूहानी साधना का रूप दिया है। ऐसे ही एक प्रतिभाशाली कलाकार हैं सलीम शहजादा, जिन्हें दुनिया ‘मास्टर सलीम’ के नाम से जानता है। मात्र 6 वर्ष की आयु में, उनके पिता और प्रख्यात सूफी गायक उस्ताद पूरन शाह कोटी ने उन्हें शास्त्रीय और सूफियाना संगीत की शिक्षा देना आरंभ कर दिया था।

लखनऊ में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘देशज’ के दौरान मास्टर सलीम ने स्वयं इस मार्मिक घटना को याद करते हुए बताया था कि जब बचपन में एक मंच प्रस्तुति के दौरान उनका सुर भटक गया, तो उनके पिता ने दर्शकों के समक्ष ही उन्हें टोक दिया। जब यह गलती अगली प्रस्तुति में भी दोहराई गई, तो उनके पिता ने चेतावनी दी कि ‘सही गाओ, वरना परिणाम अच्छे नहीं होंगे।’

आज वैश्विक मंचों पर अपनी गायकी का लोहा मनवाने वाले मास्टर सलीम बड़ी कृतज्ञता के साथ स्वीकार करते हैं कि उनके पिता के इसी कड़े अनुशासन और उसी मार का परिणाम है कि आज वे सुरों के इस शिखर पर स्थापित हैं।

13 जुलाई 1980 को पंजाब के जालंधर जिले के शाहकोट में जन्मे मास्टर सलीम का पालन-पोषण एक अत्यंत जीवंत संगीतमय वातावरण में हुआ था। उनकी माता माथरो ने पारिवारिक परिवेश को सदैव कला के अनुकूल बनाए रखा और उनके छोटे भाई परवेज पेजी ने भी आगे चलकर गायकी को ही अपना पेशा चुना।

सलीम की असाधारण प्रतिभा का ऐतिहासिक प्रमाण तब मिला, जब मात्र 7 वर्ष की आयु में उन्होंने बठिंडा दूरदर्शन के उद्घाटन समारोह में ‘चरखे दी घूक’ नामक लोक गीत का सफल प्रदर्शन किया। इस विस्मयकारी प्रस्तुति से चमत्कृत होकर पंजाब के प्रबुद्ध श्रोताओं ने उन्हें ‘मास्टर’ की प्रतिष्ठित उपाधि से नवाजा। इसके पश्चात, 10 वर्ष की आयु में, 1990 में, उनका पहला आधिकारिक संगीत एल्बम ‘चरखे दी घूक’ सुर ताल लेबल के अंतर्गत जारी किया गया, जिसने उन्हें एक राष्ट्रीय बाल कौतुक के रूप में स्थापित किया।

मास्टर सलीम का करियर उस समय एक गंभीर संकट से गुजरा जब 1990 के दशक के उत्तरार्ध में शारीरिक विकास के प्राकृतिक प्रभाव के कारण उनकी आवाज में भारीपन और स्वर-परिवर्तन आने लगा। इस स्वर-परिवर्तन के कारण उनकी तात्कालिक लोकप्रियता में भारी गिरावट आई और उनके संगीत अनुबंध काफी कम हो गए। संगीत विश्लेषकों के अनुसार, यह संक्रमण काल किसी भी किशोर गायक के लिए मानसिक रूप से अत्यंत विनाशकारी हो सकता है, परंतु सलीम ने इस कठिन अवधि को अपनी साधना का माध्यम बनाया।

उन्होंने वर्ष 2000 में दूरदर्शन के एक नववर्ष विशेष कार्यक्रम में सूफी गीत ‘अज होना दीदार माही दा’ के साथ एक नए स्वर के साथ वापसी की। इसके पश्चात उन्होंने मां दुर्गा को समर्पित कई भक्ति एल्बम जैसे ‘मेला मैया दा’ (2004) जारी किए, जिसने उनके करियर को एक नई दिशा दी।

मास्टर सलीम के बॉलीवुड पार्श्वगायन में प्रवेश की बात करें तो, जालंधर के ऐतिहासिक देवी तालाब मंदिर में आयोजित एक माता के जागरण में वे अपनी पूरी ऊर्जा के साथ भक्ति गीतों की प्रस्तुति दे रहे थे, जिसका सीधा प्रसारण एक धार्मिक टेलीविजन चैनल पर हो रहा था। इस प्रसारण को मुंबई में प्रसिद्ध संगीतकार शंकर महादेवन ने देखा। सलीम के सुरों के विस्तार और उनकी असाधारण गायकी से चकित होकर शंकर महादेवन ने तुरंत उन्हें मुंबई बुलाया और फिल्म ‘हे बेबी’ (2007) के गीत ‘मस्त कलंदर’ के पार्श्वगायन का अवसर दिया। इसके पश्चात सलीम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी गायकी से कई चार्टबस्टर गाने दिए।

उन्हें 2008 में ‘मां दा लाडला’, 2009 में ‘आहुं आहुं’ से बड़ी सफलता मिली। 2014 में अनमोल अलीशा सलीम से विवाह किया और 2021 में ‘वॉयस ऑफ पंजाब सीजन 12’ में मुख्य निर्णायक बने। मौजूदा समय में दिग्गज पंजाबी सूफी और डिवोशनल गायक मास्टर सलीम संगीत की दुनिया में काफी सक्रिय हैं। वह अपने नए गानों और लाइव कॉन्सर्ट के माध्यम से लगातार दर्शकों का मनोरंजन कर रहे हैं।

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