9 अप्रैल । आपातकाल का दौर बीत चुका था और 1977 में हुए चुनाव में इंदिरा गांधी की सत्ता उखड़ चुकी थी, तब देश को एक ऐसा पहला प्रधानमंत्री मिला था, जो गैर-कांग्रेस था, मगर जिंदगी का लंबा अरसा कांग्रेस में खपा चुका था। एक ऐसा व्यक्तित्व, जो सख्त किस्म का गांधीवादी और दीवानगी की हद तक ईमानदार रहा, मगर प्रधानमंत्री की कुर्सी कांग्रेस से दूर होकर हासिल की। यह कहानी है देश के चौथे प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की।
29 फरवरी 1896 को गुजरात के बुलसर जिले में जन्मे मोरारजी देसाई 1969 में कांग्रेस पार्टी के विभाजन के बाद संगठन के साथ ही रहे।
महात्मा गांधी के साथ उनका रिश्ता देश की आजादी से लगभग एक दशक पहले जुड़ चुका था। 1930 में जब भारत में महात्मा गांधी की ओर से शुरू किया गया आजादी के लिए संघर्ष अपने मध्य में था, देसाई का ब्रिटिश न्याय व्यवस्था में विश्वास खो चुका था, इसलिए उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर आजादी की लड़ाई में भाग लेने का निश्चय किया। यह एक कठिन निर्णय था, लेकिन देसाई ने महसूस किया कि यह देश की आजादी का सवाल था। परिवार से संबंधित समस्याएं बाद में आती हैं, देश पहले आता है।
देसाई को स्वतंत्रता संग्राम के दौरान तीन बार जेल जाना पड़ा। वे 1931 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य बने और 1937 तक गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव रहे। जब पहली कांग्रेस सरकार ने 1937 में कार्यभार संभाला, देसाई राजस्व, कृषि, वन और सहकारिता मंत्रालय के मंत्री बने।
महात्मा गांधी के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भी देसाई को गिरफ्तार कर लिया गया था। अक्टूबर 1941 में उन्हें छोड़ दिया गया और अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। इस बार उन्हें 1945 में छोड़ दिया गया। 1946 में राज्य विधानसभा के चुनावों के बाद वे मुंबई में गृह व राजस्व मंत्री बने। अपने कार्यकाल के दौरान देसाई ने ‘हलवाहा के लिए भूमि’ प्रस्ताव के लिए सुरक्षा काश्तकारी अधिकार प्रदान करके भू-राजस्व में कई दूरगामी सुधार किए।
पुलिस प्रशासन के क्षेत्र में उन्होंने लोगों और पुलिस के बीच की दूरी कम की और पुलिस प्रशासन को लोगों की जरूरतों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया, ताकि वे लोगों के जीवन और संपत्ति को सुरक्षा प्रदान कर सकें। 1952 में वे बंबई (मुंबई) के मुख्यमंत्री बने।
वह यह मानते थे कि ‘जब तक गांवों और कस्बों में रहने वाले गरीब लोग सामान्य जीवन जीने में सक्षम नहीं होंगे, तब तक समाजवाद का कोई मतलब नहीं है।’
देसाई ने किसानों और किराएदारों की कठिनाइयों को सुधारने की दिशा में प्रगतिशील कानून बनाकर अपनी इस सोच को कार्यान्वित करने का ठोस कदम उठाया। इसमें देसाई की सरकार देश के अन्य राज्यों से बहुत आगे थी। इसके अलावा, उन्होंने अडिग होकर और पूर्ण ईमानदारी से कानून को लागू किया। बंबई में उनकी इस प्रशासन व्यवस्था की सभी ने जमकर तारीफ की।
राज्यों को पुनर्गठित करने के बाद देसाई 14 नवंबर 1956 को वाणिज्य और उद्योग मंत्री के रूप में केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हो गए। बाद में उन्होंने 22 मार्च 1958 से वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाला।
देसाई ने आर्थिक योजना और वित्तीय प्रशासन से संबंधित मामलों पर अपनी सोच को कार्यान्वित किया। रक्षा और विकास संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने राजस्व को अधिक बढ़ाया, अपव्यय को कम किया व प्रशासन पर होने वाले सरकारी खर्च में मितव्ययिता को बढ़ावा दिया। उन्होंने वित्तीय अनुशासन को लागू कर वित्तीय घाटे को अत्यंत निम्न स्तर पर रखा। उन्होंने समाज के उच्च वर्गों की ओर से किए जाने वाले फिजूलखर्च को प्रतिबंधित कर उसे नियंत्रित करने का प्रयास किया।
1963 में उन्होंने कामराज योजना के अंतर्गत केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, पंडित नेहरू के बाद प्रधानमंत्री बने लाल बहादुर शास्त्री ने प्रशासनिक प्रणाली के पुनर्गठन के लिए उन्हें प्रशासनिक सुधार आयोग का अध्यक्ष बनने के लिए मनाया। लोक जीवन से संबंधित अपने लंबे और अपार अनुभव का उपयोग करते हुए उन्होंने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया।
मोरारजी देसाई 1967 में इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में उप-प्रधानमंत्री और वित्त मंत्रालय के प्रभारी मंत्री के रूप में शामिल हुए। समय के साथ नीतियों और फैसलों को लेकर इंदिरा गांधी के साथ मनमुटाव बढ़ने लगा था। नतीजन, जुलाई 1969 में इंदिरा गांधी ने उनसे वित्त मंत्रालय का प्रभार वापस ले लिया।
देसाई ने इस बात को माना कि ‘प्रधानमंत्री के पास सहयोगियों के विभागों को बदलने का विशेषाधिकार है, लेकिन उनके आत्म-सम्मान को इस बात से ठेस पहुंची कि इंदिरा गांधी ने इस बात पर उनसे परामर्श करने का सामान्य शिष्टाचार भी नहीं दिखाया। इसलिए उन्हें यह लगा कि उनके पास भारत के उप-प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था।’
हिंदुस्तान में राजनीतिक रूप से महत्वाकांक्षी होना बहुत अच्छा नहीं माना जाता, लेकिन मोरारजी देसाई ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने कभी प्रधानमंत्री बनने की अपनी इच्छा को नहीं छिपाया। वे जवाहर लाल नेहरू की मौत के बाद भी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। नाकामी हाथ लगी तो उन्होंने इंतजार किया, जब दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की भी मौत हो गई तो फिर से कोशिश की। इस बार भी नाकामी देसाई के हाथ लगी। इसके बाद पहले कामराज और फिर सीधे इंदिरा गांधी को आंख दिखाकर चले गए, लेकिन जब लौटे तो वे देश के प्रधानमंत्री बने।
मार्च 1977 के छठी लोकसभा के लिए हुए चुनाव में उन्होंने देशभर में पूरे जोर-शोर से अभियान चलाया था। चुनाव में जनता पार्टी की जबरदस्त जीत में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। देसाई गुजरात के सूरत निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गए थे। बाद में उन्हें सर्वसम्मति से संसद में जनता पार्टी के नेता के रूप में चुना गया। फिर वह दिन आया, जिसका उन्हें हमेशा से इंतजार रहा। 24 मार्च 1977, उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली।
प्रधानमंत्री के रूप में देसाई चाहते थे कि भारत के लोगों को इस हद तक निडर बनाया जाए कि देश में कोई भी व्यक्ति, चाहे वह सर्वोच्च पद पर ही आसीन क्यों न हो, अगर कुछ गलत करता है तो कोई भी उसे उसकी गलती बता सके। उन्होंने बार-बार यह कहा, ‘कोई भी, यहां तक कि प्रधानमंत्री भी देश के कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए।’
उनके लिए सच्चाई एक अवसर नहीं, बल्कि विश्वास का एक अंग था। उन्होंने शायद ही कभी अपने सिद्धांतों को स्थिति की बाध्यताओं के आगे दबने दिया। मुश्किल परिस्थितियों में भी वे प्रतिबद्धता के साथ बढ़ते गए। वह स्वयं यह मानते थे कि ‘सभी को सच्चाई और विश्वास के अनुसार ही जीवन में कर्म करना चाहिए।’
हालांकि, देसाई ने 28 जुलाई 1979 को भारत के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। जनता पार्टी सरकार में आंतरिक कलह, अविश्वास प्रस्ताव और सहयोगियों के समर्थन वापस लेने के कारण उन्हें मजबूरन इस्तीफा देना पड़ा। प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे के बाद देसाई ने 83 साल की उम्र में राजनीति से संन्यास ले लिया। इसके साथ ही, वे दिल्ली छोड़ मुंबई में रहने लगे, जहां 10 अप्रैल 1995 को 99 साल की उम्र में मोरारजी देसाई का निधन हो गया।

