N1Live Entertainment नटराज रामकृष्ण: जिन्होंने आंध्र नाट्यम और पेरिनी शिवतांडवम को दिया नया जीवन, मराठा शासक ने दी ‘नटराज’ की उपाधि
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नटराज रामकृष्ण: जिन्होंने आंध्र नाट्यम और पेरिनी शिवतांडवम को दिया नया जीवन, मराठा शासक ने दी ‘नटराज’ की उपाधि

Nataraja Ramakrishna: The man who gave new life to Andhra Natyam and Perini Shiva Tandavam, was given the title of 'Nataraja' by a Maratha ruler.

नागपुर के भव्य राजदरबार में कला समीक्षक, प्रबुद्ध विद्वान और कुलीन वर्ग के लोग मंच पर थिरकते एक 18 वर्षीय लड़के को देख रहे थे। उस लड़के के पैरों की थाप और भाव-भंगिमाओं में एक ऐसी जादुई कशिश थी, जिसने वहां उपस्थित हर शख्स को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अद्वितीय प्रस्तुति से भावविभोर होकर मराठा शासक ने उस युवा को ‘नटराज’ की उपाधि दी, जो आगे चलकर उसकी पहचान बन गई। यही नटराज रामकृष्ण थे, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य के इतिहास की दिशा बदल दी।

नटराज रामकृष्ण का जन्म 21 मार्च 1923 को एक प्रवासी तेलुगु परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम दमयंती देवी वीणा था। उनके पिता राममोहन राव नृत्य जैसी कलाओं के प्रति रूढ़िवादी दृष्टिकोण रखते थे। रामकृष्ण जब महज 3 वर्ष के थे, तब उनकी माता का साया उनके सिर से उठ गया। मद्रास के रामकृष्ण मठ और महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम की सादगी में पले-बढ़े रामकृष्ण को उनके बड़े भाई श्याम सुंदर का सहारा मिला, जिन्होंने उनके कलात्मक सपनों को पंख दिए।

रामकृष्ण ने मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई से भरतनाट्यम की बारीकियां सीखीं, तो नायडुपेटा राजम्मा से मंदिर नृत्य की जीवंत भाषा समझी। वेदांतम लक्ष्मीनारायण शास्त्री ने उन्हें कुचिपुड़ी के नाट्यशास्त्र में पारंगत किया, तो सुखदेव कार्तक और रायगढ़ के उस्तादों ने उन्हें कथक की लयबद्धता दी। चंपा बाई के सान्निध्य में उन्होंने हिंदुस्तानी ठुमरी के माध्यम से अभिनय में भावों की गहनता को समाहित करना सीखा।

ब्रिटिश औपनिवेशिक काल और ‘एंटी-नॉट आंदोलन’ ने आंध्र प्रदेश की पारंपरिक देवदासी नृत्य शैलियों को हाशिए पर धकेल दिया था। रामकृष्ण ने इस लुप्तप्राय धरोहर को सहेजने के लिए दो दशकों तक कड़ा शोध किया और इसे ‘आंध्र नाट्यम’ के रूप में पुनर्गठित किया। उन्होंने इसे तीन रूपों में वर्गीकृत किया।

आगम नर्तनम : मंदिरों के गर्भगृह में की जाने वाली अनुष्ठानिक प्रस्तुति।

आस्थान नर्तनम : राजदरबारों में बुद्धिजीवियों के मनोरंजन के लिए की जाने वाली कला।

प्रबंध नर्तनम : ‘नवजनार्दन पारिजात’ जैसी लास्य-प्रधान एकल महिला प्रस्तुतियां।

इस पुनरुद्धार के दौरान उन्हें एक अजीब लैंगिक सामाजिक संकट का सामना करना पड़ा। सामाजिक कलंक के कारण कुलीन परिवारों की लड़कियां इस कला को सीखने से हिचक रही थीं। तब रामकृष्ण ने अपने पुरुष शिष्यों को स्त्री-पात्रों के अभिनय में प्रशिक्षित किया।

काकतीय राजवंश के समय युद्ध पर जाने से पूर्व सैनिक भगवान शिव के समक्ष जो वीर रस से ओत-प्रोत नृत्य करते थे, उसे ‘पेरिनी शिवतांडवम’ कहा जाता था। साम्राज्य के पतन के साथ यह शौर्य नृत्य इतिहास की परतों में दब गया। डॉ. रामकृष्ण ने वारंगल के प्रसिद्ध ‘रामप्पा मंदिर’ की प्रस्तर मूर्तियों के ज्यामितीय कोणों और काकतीय सेनापति जयप सेनानी द्वारा रचित ‘नृत्य रत्नावली’ (1253-54 ईस्वी) के श्लोकों को मिलाकर पेरिनी के शारीरिक व्याकरण का पुनर्गठन किया। उन्होंने मृदंगम की तीव्र थाप और शैव आगमों के संयोजन से इस पुरुष प्रधान तांडव नृत्य को नवजीवन दिया।

रामकृष्ण केवल एक नर्तक नहीं, बल्कि एक महान शिक्षाविद् भी थे। उन्होंने 45 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें 1968 में राज्य सरकार द्वारा पुरस्कृत ‘दक्षिणात्युल नाट्यकला चरित्र’ मील का पत्थर साबित हुई। उन्होंने विश्वविद्यालयों में आंध्र नाट्यम के पाठ्यक्रम शुरू करवाए। कला के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान के लिए उन्हें 1991 में राजा-लक्ष्मी पुरस्कार, 1992 में पद्मश्री और 2010 में देश का सर्वोच्च कलात्मक सम्मान ‘संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप’ प्रदान किया गया।

7 जून 2011 को हैदराबाद में इस महान विभूति ने अंतिम सांस ली।

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