January 16, 2026
Entertainment

यादों में नय्यर : ‘बाबूजी धीरे चलना’, ‘चल अकेला’ से लेकर ‘सितारों के सफर’ पर ले जाने वाले संगीतकार

Nayyar in memories: The composer who took us on a journey from ‘Babuji Dheere Chalna’, ‘Chal Akela’ to ‘Sitaron Ke Safar’

हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में कई नाम आए और चले गए, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो वक्त की धूल से कभी धुंधले नहीं पड़े। ऐसा ही एक नाम है ओ. पी. नय्यर। रिदम किंग, ताल के बादशाह और बिना सितार के संगीत रचने वाले इस जादूगर ने अपने सुरों से श्रोताओं को कभी महफिलों में झुमाया, तो कभी तन्हाई में हौसला दिया। उनका संगीत सिर्फ सुनने के लिए नहीं था, उसे महसूस किया जाता था।

ओंकार प्रसाद नय्यर का जन्म 16 जनवरी 1926 को अविभाजित भारत के लाहौर में हुआ। बचपन से ही संगीत में उनकी गहरी रुचि थी, लेकिन परिवार चाहता था कि वे पढ़ाई पर ध्यान दें। सोच यह थी कि संगीत में पड़ गए तो भविष्य अनिश्चित हो जाएगा। नय्यर साहब का दिल तो सुर-ताल में बस चुका था। वे छुप-छुपकर हारमोनियम से दोस्ती करते और धुनें गुनगुनाते रहते।

कहते हैं कि ओ. पी. नय्यर फिल्मों में संगीतकार नहीं, बल्कि हीरो बनने का सपना लेकर आए थे, लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था। हीरो बनने के लिए दर-दर भटके, रिजेक्शन पर रिजेक्शन मिला। आखिरकार किसी ने सलाह दी कि कुछ और कर लो। वही ‘कुछ और’ उनके लिए संगीत बन गया। यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा सफर, जिसने हिंदी सिनेमा को नई धड़कन दी।

1952 में आई फिल्म ‘आसमान’ से उन्हें पहला मौका मिला। फिल्म चली, लेकिन असली पहचान मिली गुरुदत्त की फिल्मों से। ‘आर-पार’, ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’, ‘सीआईडी’ और ‘तुमसा नहीं देखा’, इन फिल्मों के गानों ने ओ. पी. नय्यर को घर-घर पहुंचा दिया। ‘बाबूजी धीरे चलना’, ‘कभी आर कभी पार लागा तीरे नजर’, ‘ऐ लो मैं हारी पिया’, ‘बाबूजी धीरे चलना… बड़े धोखे हैं इस राह में’, ‘आओ हुजूर तुमको’ और ‘चल अकेला’ जैसे गाने आज भी उतने ही ताजे लगते हैं, जितने दशकों पहले थे।

ओ. पी. नय्यर की सबसे बड़ी खासियत थी उनका रिदम। उनके गीतों में पंजाबी लोकसंगीत की झलक, वेस्टर्न बीट्स का तड़का और देसी ठाठ सब कुछ एक साथ मिलता था। हैरानी की बात यह है कि वे अपने गानों में कभी सितार का इस्तेमाल नहीं करते थे, फिर भी उनका संगीत बेहद सुरीला और प्रभावशाली होता था। वे मानते थे कि हर गीत की आत्मा उसकी लय में होती है।

लता मंगेशकर के साथ उनका विवाद भी काफी चर्चित रहा। फिल्म ‘आसमान’ के दौरान रिकॉर्डिंग को लेकर मतभेद हुए और फिर दोनों ने कभी साथ काम नहीं किया। इसके बाद ओ. पी. नय्यर ने शमशाद बेगम, गीता दत्त और खासतौर पर आशा भोसले के साथ काम किया। आशा भोसले के करियर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में ओ. पी. नय्यर की भूमिका को कोई नकार नहीं सकता। ‘उड़ें जब-जब जुल्फें तेरी’, ‘आओ हुजूर तुमको’, ‘ये है रेशमी जुल्फें’, इन गीतों ने आशा की आवाज को एक नई पहचान दी।

नैय्यर और आशा भोसले का रिश्ता सिर्फ पेशेवर नहीं था, बल्कि निजी भी था। दोनों करीब आए, संगीत में साथ में काम किया और कई सालों तक एक-दूसरे के पूरक बने रहे। लेकिन, यही रिश्ता बाद में उनके जीवन का सबसे दर्दनाक अध्याय भी बन गया। 1972 में दोनों के रास्ते अलग हो गए। इसके बाद ओ. पी. नय्यर का करियर भी धीरे-धीरे ढलान पर आने लगा।

इसके बावजूद उनके संगीत की चमक कभी फीकी नहीं पड़ी। ‘चल अकेला, चल अकेला’ जैसे गीतों में जहां जीवन का दर्शन है, वहीं ‘मेरा नाम चिन चिन’ जैसी मस्ती भरी धुनें भी उनके हुनर का सबूत हैं। उन्होंने शम्मी कपूर को ‘जंपिंग स्टार’ बनाने में भी अहम भूमिका निभाई। ‘तुमसा नहीं देखा’ के गीतों ने शम्मी की छवि को नया रंग दिया।

एक समय था जब ओ. पी. नय्यर हिंदी सिनेमा के सबसे महंगे संगीतकारों में गिने जाते थे। लेकिन जिंदगी के आखिरी दौर में हालात बदले, यहां तक कि उन्हें अपना घर तक बेचना पड़ा। बावजूद इसके, उन्होंने कभी अपने फैसलों पर अफसोस नहीं किया। वे स्वाभिमानी थे और उसी शान से जिए।

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