N1Live National ‘सामना’ में पहलगाम हमले की बरसी पर शिवसेना (यूबीटी) ने उठाए सवाल, कहा-असली साजिशकर्ताओं को सजा मिली या न्याय अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की भेंट चढ़ गया
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‘सामना’ में पहलगाम हमले की बरसी पर शिवसेना (यूबीटी) ने उठाए सवाल, कहा-असली साजिशकर्ताओं को सजा मिली या न्याय अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की भेंट चढ़ गया

On the anniversary of the Pahalgam attack in Saamana, Shiv Sena (UBT) raised questions, asking whether the real conspirators were punished or justice was sacrificed to international diplomacy.

23 अप्रैल । शिवसेना (यूबीटी) ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले की पहली बरसी पर तीखी प्रतिक्रिया दी। पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया कि एक साल बाद भी देश के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस नरसंहार के असली साजिशकर्ताओं को सजा मिली या फिर न्याय अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की भेंट चढ़ गया।

संपादकीय में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने केंद्र सरकार और जांच एजेंसियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि देश ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर अपनी बात दुनिया के सामने रखने के लिए कई सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल विदेश भेजे, लेकिन बहुत कम देशों ने भारत का खुलकर समर्थन किया। वहीं, देश के भीतर इस हमले की जांच भी ठहरती हुई नजर आ रही है।

लेख में यह भी सवाल उठाया गया कि आखिर आतंकवादी सीमा से करीब 200 किलोमीटर का सफर तय कर पहलगाम तक बिना पकड़े कैसे पहुंच गए और हमले के बाद जंगलों में कैसे फरार हो गए। इन गंभीर सुरक्षा चूकों पर अब तक स्पष्ट जवाब नहीं मिला है।

संपादकीय में इस हमले को 2019 के पुलवामा हमले के बाद क्षेत्र का सबसे बड़ा आतंकी हमला बताया गया है। कहा गया कि एक साल बीत जाने के बावजूद लोगों का दर्द कम नहीं हुआ है और न्याय को लेकर कई अहम सवाल आज भी अनुत्तरित हैं।

हमले के बाद भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शुरू किया था, जिसमें पाकिस्तान के अंदर आतंकी ठिकानों और सैन्य चौकियों को निशाना बनाया गया। तीन दिनों तक चले इस संघर्ष के बाद ऐसा माना जा रहा था कि आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई हो सकती है।

संपादकीय के अनुसार, यह अभियान अचानक उस समय रुक गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम की घोषणा की, जिसे भारत और पाकिस्तान दोनों ने स्वीकार कर लिया। ट्रंप ने बाद में दावा भी किया कि उन्होंने व्यापार प्रतिबंधों की धमकी देकर इस संघर्ष को रुकवाया।

लेख में कहा गया कि भारत में आम जनता के बीच इस बात को लेकर नाराजगी है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते पाकिस्तान के आतंकी ढांचे को पूरी तरह खत्म करने का मौका गंवा दिया गया।

संपादकीय में आगे यह भी आरोप लगाया गया कि पिछले एक साल में वैश्विक स्तर पर भारत की कूटनीतिक स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। इसमें दावा किया गया कि अमेरिका ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर का व्हाइट हाउस में रेड कार्पेट स्वागत किया, जबकि भारत पर भारी शुल्क लगाए गए।

इतना ही नहीं, डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान-इजरायल संघर्ष में पाकिस्तान को मध्यस्थ की भूमिका भी सौंपी, जिससे उस देश की अंतरराष्ट्रीय साख बढ़ी, जिस पर पहलगाम हमले का आरोप है।

संपादकीय ने इस हमले को देश के लिए ‘नासूर’ करार देते हुए कहा कि एक साल बाद भी यह घाव भरा नहीं है, और देश का दर्द अब भी उतना ही गहरा है।

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